Wednesday, August 4, 2010
धिक्कार है ऐसे रुपयों पर तो धिक्कार है ऐसी इज्जत पर भी !
कल के समाचार पत्रों में जयपुर से एक समाचार छपा कि एक महिला ने अपनी सास के उपचार के लिये 500 रुपये नहीं दिये और इस बात पर पति से झगड़ा करके घर में रखे पांच लाख रुपयों के साथ जल कर मर गई। संसार में ऐसा भी कहीं होता है ! रुपये आखिर किस लिये होते हैं ! घर के सदस्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये या फिर जलकर मरने के लिये ! यह पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि इस प्रकरण में जो कुछ भी हुआ, वैसा कभी–कभार ही होता है। अन्यथा कौन नहीं चाहता कि उसके परिजन स्वस्थ रहें और उनका उपचार हो ! लोग तो घर की जमीनें और मकान बेचकर अपने परिजनों का उपचार करवाते हैं, जबकि इस प्रकरण में तो घर में पांच लाख रुपये रखे थे और उनमें से केवल पांच सौ रुपये पति द्वारा मांगे गये थे।
वस्तुत: यह कहानी रुपयों के प्रति मोह की नहीं है। यह कहानी है व्यक्तिगत स्वभाव की विकृति की। स्वभाव की यह विकृति सामान्यत: जन्मगत और व्यक्तिगत होती है किंतु संस्कार जन्य भी होती है। अच्छे संस्कारमय वातावरण में यदि लालन पालन हो तो मनुष्य की व्यक्तिगत विकृतियों को पर्याप्त सीमा तक नियंत्रित किया जा सकता है किंतु आज के जीवन में मनुष्य जिस आपाधापी में लग गया है उसमें संस्कार निर्माण की बात जैसे भुला ही दी गई है। ऐसे लोग इंसानों से नहीं रुपयों से प्यार करते हैं। धिक्कार है ऐसे रुपयों पर!
कल के ही दिन उत्तर प्रदेश में हाथरस के पास स्थित एक गांव का भी समाचार था कि एक आदमी ने अपनी पत्नी के चरित्र पर संदेह होने पर उसकी हत्या करके उसका रक्त अपने दोनों बच्चों को पिलाया। ऐसे जघन्य अपराध भले ही हमारे समाज का वास्तविक चेहरा नहीं हैं किंतु ये जब–तब होते ही रहते हैं। ऐसी दुर्घटनायें भी व्यक्तिगत स्वभाव की विकृति का परिणाम हैं। संस्कारों के अभाव के कारण आदमी अपने क्रोध को नियंत्रण में नहीं रख पाता और ऐसा कुछ कर बैठता है जिसे सुनकर दूसरों का भी कलेजा कांप जाये। जिस इज्जत को लेकर पति इतना क्रोधित हुआ कि इंसानियत की सीमा से नीचे गिरकर हैवान बन गया, धिक्कार है ऐसी इज्जत पर !
वस्तुत: इन दोनों ही प्रकरणों में दण्डित कौन हुआ? क्या केवल वह पति जिसके पांच लाख रुपये और पत्नी जल गई ? या फिर स्वयं वह पत्नी जो अपने ही क्रोध की अग्नि में जलकर भस्म हो गई ? दूसरे प्रकरण में भी वास्तविक दण्ड किसे मिला ? क्या केवल उस पत्नी को जिसे अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा या फिर उस पति को भी जिसने अपने ही हाथों से हंसते खेलते परिवार में आग लगा ली ?
एक अंग्रेज कवि ने लिखा था कि कविता में धन नहीं होता और धन में कविता नहीं होती। वस्तुत: जीवन भी एक ऐसी ही विचित्र पहेली है जिसमें यदि कविता आ जाये तो धन नहीं रहता और धन आ जाये तो कविता नहीं रहती किंतु ये दोनों प्रकरण ऐसे हैं जिनमें न कविता है और न धन है, बस संस्कारहीनता के मरुस्थल में जन्मी हुई मरीचिकाएं हैं जिनके पीछे दौड़ता हुआ मनुष्य छटपटा कर दम तोड़ देता है और तृष्णाएं अतृप्त रह जाती हैं।
Monday, August 2, 2010
कपड़े ऐसे कि फिल्मी तारिकाएं भी शर्मा जायें !
सर्वोच्च न्यायालय ने 1978 में दिये गये एक निर्णय में एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि एक नागरिक को हाड़–मांस की तरह जीवित रहने का अधिकार नहीं है, उसके जीवन के अधिकार में यह सम्मिलित है कि उसे दोनों समय रोटी मिले और चौबीसों घण्टे सम्मान मिले। इस तरह की टिप्पणियां ऐतिहासिक होती हैं, जो लम्बे समय तक स्मरण रखी जाती हैं तथा राष्ट्रीय जन जीवन को दिशा देती हैं। कल पूना में एक महाविद्यालय के लगभग पांच सौ छात्र–छात्राओं को अर्धरात्रि में एक गांव में शराब पार्टी करते हुए पकड़ा गया तथा देश के कई महानगरों में कतिपय सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ताओं ने फ्रैण्डशिप डे मना रहे युवक युवतियों को पीटा, तो मुझे सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी बरबस स्मरण हो आई।
पूना में पुलिस ने महाविद्यालयी छात्र–छात्राओं पर वाद स्थापित किया है क्योंकि उन्होंने देर रात पार्टी करने तथा निर्धारित समय के बाद माइक बजाने की पूर्वानुमति नहीं ली। पुलिस के अनुसार इन छात्र–छात्राओं का इतना ही अपराध है ! पुलिस ने कुछ सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ताओं पर भी वाद स्थापित किये क्योंकि नागरिकों की पिटाई करना अपराध है। दोनों ही प्रकरणों में विधि सम्मत कार्यवाही की गई है किंतु जब मैं सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी पर विचार करता हूँ तो मुझे लगता है कि जहां एक ओर देश के हर नागरिक को चौबीसों घण्टे सम्मान उपलब्ध रहने की अपेक्षा की गई है, वहीं दूसरी ओर इन दोनों ही प्रकरणों में सवा सौ करोड़ नागरिकों के आत्म सम्मान को गहरी ठेस पहुंचाई गई है।
जिन अभिभावकों ने अपने संतानों को सुदूर किसी अनजान गांव में शराब पार्टी में सम्मिलित देखा होगा, उनका सिर अपने पड़ौसियों, सम्बन्धियों, मित्रों तथा परिचितों के समक्ष किस तरह से झुका होगा, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। इस पार्टी में सम्मिलित महाविद्यालयी छात्राओं के परिधान ऐसे थे जिन्हें देखकर फिल्मी तारिकाएं भी लजा जायें, पूरा समाज लजा लाये। हेमामालिनी, रेखा और जयाप्रदा आदि विख्यात तारिकाएं फिल्मी पर्दे पर भले ही कैसे ही वस्त्र पहनती रही हों किंतु वे सार्वजनिक स्थलों पर अत्यंत शालीन वस्त्रों में आती हैं। नरगिस दत्त सदैव सिर पर पल्लू लेकर चलती थीं किंतु आज की छात्राओं ने फिल्मी परिधानों को जीवन की वास्तविकता समझ लिया है।
शराब की खुली बोतलें, अधनंगी युवतियां, अर्धरात्रि का समय और सुदूर ग्रामीण क्षेत्र! इस परिवेश से अनुमान लगाया जा सकता है कि पार्टी में युवक क्या कर रहे होंगे ! वहाँ व्यभिचार नहीं तो कम से कम अद्र्धव्यभिचार जैसी स्थिति अवश्य रही होगी। यह भी स्मरण दिला देना प्रासंगिक होगा कि विगत कुछ वर्षों में विद्यालयी एवं महाविद्यालीय छात्राओं में गर्भपात करवाने का आंकड़ा तेजी से बढ़ा है। जब पूरे समाज से अपेक्षा की जा रही हो कि वह नागरिकों को चौबीसों घण्टे सम्मान उपलब्ध करवायेगा तब यह कैसी विडम्बना है कि अपने ही बच्चे उस सम्मान को खुरच कर नष्ट करने पर तुले हुए हैं !
यह सही है कि एक नागरिक के द्वारा दूसरे नागरिक की पिटाई करना अपराध है किंतु क्या पूना की शराब पार्टी के परिप्रेक्ष्य में ऐसा नहीं लगता है कि यदि सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ता, पथभ्रष्ट युवाओं को फ्रैण्डशिप डे तथा वेलेण्टाइन डे के नाम पर सार्वजनिक रूप से मर्यादाओं का उल्लंघन करने पर उन्हें प्रताडि़त करते हैं तो वे समाज के सम्मान की रक्षा करने का प्रयास कर रहे हैं तथा युवाओं को व्यभिचार के मार्ग पर बढ़ने से रोक रहे हैं!
Monday, July 19, 2010
एक प्रियंका चौपड़ा हैं और एक ये हैं !
रविवार के दिन जोधपुर में दर्दनाक दुर्घटना हुई। एक दादी अपनी पोती को लेकर चलती हुई रेल से नीचे गिर पड़ी। दादी तो सही–सलामत बच गई किंतु बच्ची का हाथ कट गया। दादी इसलिये गिरी क्योंकि उस डिब्बे में इतनी भीड़ थी कि दादी दरवाजे से आगे नहीं बढ़ सकी। दादी आगे इसलिये नहीं बढ़ सकी क्योंकि डिब्बे में क्षमता से अधिक लोग भरे हुए थे। डिब्बे में क्षमता से अधिक लोग इसलिये भरे हुए थे क्योंकि भारत की जनसंख्या आज पूरी गति से बढ़ रही है। उसे चीन से आगे निकलने की जल्दी जो पड़ी है! आज अनेक विकसित देशों में जनसंख्या स्थिरिकरण का लक्ष्य प्राप्त कर लिया गया है, वहां जनसंख्या नहीं बढ़ती। इसलिये वहां इस तरह की समस्याएं उत्पन्न नहीं होतीं। न तो हर वर्ष सड़कों की लम्बाई बढ़ाने की आवश्यकता है, न ट्रेनों की संख्या। न हर वर्ष नये स्कूल खुलते हैं, न चिकित्सालय। जो संसाधन एक बार विकसित कर लिये जाते हैं, समय बीतने के साथ–साथ उनके संरक्षण और जीर्णोद्धार का काम किया जाता है। जबकि भारत में चाहे जितनी भी नई सड़कें, रेलगाडि़यां, स्कूल, चिकित्सालय, पुल, बिजलीघर, सीमेण्ट के कारखाने बना दो, अगले साल वे कम पड़ जायेंगे। भारत की जनसंख्या में हर साल एक आस्ट्रेलिया के बराबर जनसंख्या जुड़ जाती है।ढाई साल की बालिका का कटा हुआ हाथ लम्बे समय तक हमें स्मरण करवाता रहेगा कि हमने अपने देश को किस तरह ठसाठस जनसंख्या वाला देश बना दिया है कि बच्चों को भी ट्रेन में बैठने का स्थान नहीं बचा है। मैं समझता हूँ कि पूरे राष्ट्र को उन बच्चों से क्षमा मांगनी चाहिये जो अपने बड़ों की गलतियों का दण्ड भुगत रहे हैं। इस पूरे प्रकरण में यह तथ्य भी दुखदायी है कि जो दादी ट्रेन से गिरी उसकी उम्र केवल 38 साल है और जिस पोती का हाथ कटा उसकी आयु ढाई साल है। अर्थात् दादी और पोती की आयु में केवल 35–36 साल का अंतर है। क्या यह उम्र दादी बनने के लिये सही है? यदि 35 साल की उम्र में औरत दादी बनेगी तो फिर रेल के डिब्बे में बैठने के लिये जगह कैसे बचेगी? है किसी के पास इस प्रश्न का उत्तर?अभी कुछ ही दिन पहले, संभवत: इसी सप्ताह सिने अभिनेत्री प्रियंका चौपड़ा ने अपनी आइसवीं सालगिरह मनाई है। एक ओर प्रियंका चौपड़ा जैसी औरतें इस देश में रहती हैं जिन्होंने 28 साल की आयु में भी विवाह नहीं किया और दूसरी ओर रेल से नीचे गिरने वाली दादी है जो 35–36 साल की उम्र में दादी बन जाती है। संभवत: इसी को कहते हैं– दुनिया के समानान्तर एक और दुनिया! आज महिलाएं पुरुषों के कदम से कदम बढ़ाकर हर क्षेत्र में अपनी योग्यता सिद्ध कर रही हैं, फिर ऐसा क्यों है कि आज भी करोड़ों महिलाएं सोलहवीं सदी की परम्पराओं से बंधी हुई हैं और गुे–गुडि़यों से खेलने की आयु में पति, ससुराल और बच्चों की जिम्मेदारी ओढ़ लेती हैं? चीन हमसे बहुत बड़ा है, आकार में भी, जनसंख्या में भी किंतु उसने विगत कुछ दशकों से अपने नागरिकों के लिये एक बच्चे का नियम लागू कर रखा है। इसी के चलते चीन अपनी जनसंख्या को स्थिर करने का लक्ष्य शीघ्र ही प्राप्त कर लेगा किंतु मुझे भय है कि हमारे देश की रेलों के थर्ड क्लास के डिब्बे इतने ठसाठस भर जायेंगेे जिनसे गिरकर हाथ–पैर गंवाने वालों की संख्या बढ़ती ही चली जायेगी। यह दूसरी बात है कि डिब्बों के बाहर थर्ड क्लास की जगह सैकेण्ड क्लास लिखा होगा!
Monday, June 28, 2010
दो पाटों के बीच में कौन पिसना चाहता है। !
अपने पिछले आलेख जिंदगी के बस स्टॉप पर भी समय नहीं रुकता ! में मैंने लिखा था कि टाइम इज मनी के नारे ने भारतीय नारियों को उनकी घरेलू भूमिकायें अधूरी छोड़कर नौकरियों की ओर दौड़ा दिया। इस पर निर्मला कपिलाजी ने मेरे ब्लॉग पर आकर टिप्पणी की है कि वे मेरी इस बात से सहमत नहीं। भारतीय नारियों को उसके शोषण और उन पर हो रहे अत्याचारों और समान अधिकार ने उन्हें इस राह पर चलाया। अगर आदमी जरा सा भी अपने अहंकार से ऊपर उठकर उसे सम्मान देता, यह कभी नहीं होता, कौन नारी चाहती है कि वह दो पाटों के बीच में पिसे। इस अंधी दौड़ के और भी कई कारण हैं न कि टाइम इज मनी।
मैं निर्मलाजी की लगभग सारी बातों से सहमत हूँ। यह सही है कि भारतीय समाज में हर औरत से राजा हरिश्चंद्र की रानी तारामती की तरह व्यवहार करते रहने की अपेक्षा की गई जो हर हाल में पति की आज्ञाकारिणी बनी रहे और तरह-तरह के कष्ट पाकर पति तथा उसके परिवार की सेवा करे किंतु अधिकांश पुरुषों ने स्वयं को भारतीय नारी के सम्मुख राजा हरिश्चंद्र की तरह प्रस्तुत नहीं किया। मैंने उन पुरुषों को देखा है जिन्होंने अपनी कमाई को शराब, जुए अथवा परस्त्रीगमन जैसी बुराइयों में उड़ा दिया। उन्होंने शराब के नशे में अपनी पत्नी को पीटा और घर से निकाल दिया।
जिन घरों में पुरुष ऐसे थे, उन घरों में निश्चित रूप से परिवार के भरण पोषण की जिम्मेदारी औरतों पर आ पड़ी किंतु सवाल यह है कि भारतीय समाज में कितने पुरुष ऐसे हैं जो शराब पीकर अपनी पत्नी को पीटते हैं? कितने पुरुष ऐसे हैं जो अहंकार के कारण पत्नी को सम्मान नहीं देते? कितने पुरुष ऐसे हैं जिन्होंने अपने घरों में स्त्रियों पर अत्यार किये और उन्हें घर में अपने बराबर का सदस्य नहीं समझा? मैं समझता हूँ कि यदि प्रतिशत में बात की जाये तो ऐसे दुराचारी, अत्याचारी, अहंकारी पुरुषों की संख्या एक प्रतिशत से अधिक नहीं होगी। आप दस प्रतिशत मान लीजिये ! दस प्रतिशत पुरुषों की गलती के लिये सौ प्रतिशत पुरुषों पर दोषारोपण करना वस्तुत: देश में फैलाये गये एक भ्रम का परिणाम है। मैं समझता हूँ कि जितने प्रतिशत पुरुष अपने घरों की महिलाओं पर अत्याचार करते हैं तो उतनी ही प्रतिशत औरतें भी हैं जो अपने पतियों पर अत्याचार करती हैं। फिर भी पूरी स्त्री जाति को तो कोई कटघरे में खड़ा नहीं करता ! करना भी नहीं चाहिये। मेरा यह अनुभव है कि जब भी औरतों के सम्बन्ध में कुछ कहा जाता है, एक विशेष मानसिकता से ग्रस्त लोग उसका विरोध करने के लिये आ खड़े होते हैं और मूल विषय से ध्यान भटका देते हैं। समाज न तो स्त्री के बिना चल सकता है और न पुरुष के बिना। हर पुरुष ने माँ के पेट से जन्म लिया है और हर स्त्री किसी पिता की पुत्री है। मेरा पिछला आलेख इस विषय पर नहीं था कि औरतें कमाने के लिये घर से बाहर क्यों निकलीं? मैं तो समाज का ध्यान इस ओर आकर्षित करना चाहता था कि केवल पैसे के लिये जीवन भर हाय-तौबा मचाने से व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र के जीवन में समस्याएं उत्पन्न होती है। सुख-चैन तिरोहित हो जाते हैं। पैसा सबको चाहिये किंतु कितना चाहिये और किस कीमत पर चाहिये, इसके बारे में कभी तो बैठकर विचार करें। फिर भी निर्मला कपिलाजी का आभार है क्योंकि उन्होंने एक बड़े सत्य की ओर सबका ध्यान आकर्षित किया है कि दो पाटों के बीच में कौन पिसना चाहता है।
चींटियों को मछलियाँ बनने में देर नहीं लगती !
सामान्यत: देश, काल और पात्र मिलकर परिस्थितियों का निर्माण करते हैं किंतु प्राय: देश और काल, पात्रों को अधिक प्रभावित करते हैं। भारत सरकार ने समाचार पत्रों में भारत तथा उसके पड़ौसी देशों में पैट्रोलियम पदार्थों के भाव प्रकाशित करवाये हैं जिनके अनुसार एलपीजी गैस सिलैण्डर का भाव पाकिस्तान में 577 रुपये, बांगलादेश में 537 रुपये, श्रीलंका में 822 रुपये, नेपाल में 782 रुपये तथा भारत में 345 रुपये प्रति सिलैण्डर है और कैरोसिन का भाव पाकिस्तान में 36 रुपये, बांगलादेश में 29 रुपये, श्रीलंका में 21 रुपये, नेपाल में 39 रुपये तथा भारत में 12.32 रुपये प्रति लीटर है।
ये पांचों देश दक्षिण एशिया में स्थित हैं। इन पांचों देशों में लोकतंत्र है। पांचों देश गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी से त्रस्त हैं। पांचों देश अंग्रेजों के पराधीन रहे हैं। पांचों ही देशों में जनता का अपने धर्म पर अटूट विश्वास है। पांचाें ही देशों की जलवायु गर्म है। पांचों देशों में जनसंख्या ठूंस-ठूंस कर भरी हुई है। फिर क्या कारण है कि इन पांचों देशों में पैट्रोलियम पदार्थों के भावों में इतना अंतर है!
सारे तत्व लगभग एक से होने पर भी देशों का अंतर समझे जाने योग्य है। भारत को हमारे ऋषियों ने अकारण ही महान नहीं कहा है। दूसरे देशों से तुलना करने पर भारत की विलक्षणता स्वत: सिध्द होती है। देश को यह महानता, राष्ट्रीय अनुशासन, सांस्कृतिक विलक्षणता और राष्ट्रप्रेम से प्राप्त होती है किंतु जैसे-जैसे प्रजा के जीवन में उच्छृंखलता आती है, लोग संस्कृति को भूलकर अपने देश की अपेक्षा पूंजी से प्रेम करने लगते हैं तो देश की महानता नष्ट हो जाती है। हमारे पड़ौसियों की महानता इसीलिये नष्ट हुई है। वहाँ की प्रजाएँ अपने देश से प्रेम नहीं करतीं और न ही राष्ट्रीय अनुशासन में बंधे रहना चाहती हैं। उनमें अशिक्षा, बेरोजगारी, महंगाई और निर्धनता चरम पर है। वहाँ से जनसंख्या का पलायन भारत की ओर होता रहा है। भारत अपनी प्रजा पर गर्व कर सकता है और कहा जा सकता है कि जब तक भारत की प्रजा राष्ट्र प्रेम और राष्ट्रीय अनुशासन में आबध्द रहेगी, तब तक राष्ट्र हमारे लिये सुखकारी बना रहेगा। अन्यथा चींटियों को मछलियों का स्थान लेने में अधिक समय नहीं लगता।
जिंदगी के बस स्टॉप पर भी समय नहीं रुकता !
टोकियो बसस्टॉप पर लगे एक बोर्ड पर लिखा है- यहाँ केवल बसें रुकती हैं, समय नहीं रुकता। सही बात है, संसार में केवल समय ही ऐसा ज्ञात तत्व है जो सूर्य, धरती और आकाशगांगाओं के चलना आरंभ करने से पहले भी चल रहा था। यदि सूरज अपनी समस्त ऊर्जा खोकर और धरती अपना गुरुत्वाकर्षण खोकर मिट जायें तब भी समय तो चलता ही रहेगा। हम सबने समय के पेट से जन्म लिया है और समय आने पर हम फिर इसी में चले जायेंगे। हम कुछ नहीं हैं केवल समय की शोभा हैं, फिर भी हम लोग समय की कमी का अशोभनीय रोना रोते रहते हैं। वस्तुत: समय किसी के पास कम या अधिक नहीं होता, वह तो हर आदमी को नियति ने जितना दिया है, उतना ही होता है। समय के लिये हमारा रुदन कृत्रिम है और मनुष्य जाति को अकारण दुखी करने वाला है।
संभवत: बिजनिस मैनेजमेंट पढ़ाने वाले लोगों ने सबसे पहले टाइम इज मनी कहकर लोगाें को समय की कमी का रोना रोने के लिये उकसाया। इस नारे ने लोगों का सुख और चैन छीनकर उनके मस्तिष्कों में आपाधापी भर दी। जिसने भी इस नारे को सुना वह अपने समय को धन में बदलने के लिये दौड़ पड़ा। इसी नारे की देन है कि संसार में कहीं भी तसल्ली देखने को नहीं मिलती। रेल्वे स्टेशनों, बैंकों और अस्पतालों की कतारों में खड़े लोग अपने से आगे खड़े लोगों को पीछे धकेल कर पहले अपना काम करवाना चाहते हैं।
टाइम इज मनी के नारे ने भारतीय नारियों को उनकी घरेलू भूमिकाएं अधूरी छोड़कर नौकरियों की ओर दौड़ा दिया। आखिरकार उनके पास भी कुछ तो समय है ही, जिसे धन में बदला जा सकता है। समय को धन में बदलने के लिये आदमियों ने घर के बूढ़े सदस्यों को वृध्दाश्रमों में, बच्चों को क्रैश और डे-बोर्डिंग में तथा परिवार के विक्षिप्त सदस्यों को तीर्थस्थलों और जंगलों में छोड़ दिया क्योंकि इनकी सेवा करेंगे तो समय को धन में कब बदलेंगे ! लोग बिना समय गंवाये करोड़पति बनना चाहते हैं, करोड़पतियों को अपना समय अरबपति बनने में खर्च करना है। इसी आपाधापी को देखकर गुरुदत्ता ने कहा था- ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है !
टाइम इज मनी की विचित्र व्याख्या के विपरीत संसार में कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो अपने समय को इस तरह प्रयोग करते हैं जो समय की सीमा को लांघ जाते हैं। मदनलाल धींगरा ने सन् 1909 में कर्जन वायली की सरेआम हत्या की। जज ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई। इस पर धींगरा ने कहा- आज तुम मुझे फांसी पर चढ़ा दो किंतु आने वाले दिनों में हमारा भी समय आयेगा। अर्थात् वे जानते थे कि समय केवल शरीर के रहने तक साथ रहने वाली चीज नहीं है, वह तो शरीर के मरने के बाद भी रहेगा। भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्ता ने पार्लियामेंट में बम फैंका था। पूरा पार्लियामेंट धुएं से भर गया, वे चाहते तो इस समय का उपयोग भागने में कर सकते थे किंतु उन्हें अपने समय को धन में नहीं बदलना था, देश की आजादी में बदलना था। इसलिये वे वहीं खड़े रहे और फांसी के फंदे तक जा पहुंचे। उन्हें ज्ञात था कि समय फांसी के फंदे के साथ समाप्त नहीं होगा, वह तो आगे भी चलता ही रहेगा। सही बात तो यह है कि समय टोकियो के बसस्टॉप पर तो क्या, जीवन के बसस्टॉप पर भी नहीं रुकता।
Monday, June 21, 2010
जिस बात पर विवेकानंद हँसे, उसी बात पर कबीर रो चुके थे !
आज मेरे मोबाइल पर एक विचित्र एस.एम.एस. आया जिसमें लिखा था– लोग मुझ पर हँसते हैं क्योंकि मैं सबसे अलग हूँ। मैं भी उन पर हँसता हूँ, क्योंकि वे सब एक जैसे हैं। –स्वामी विवेकानंद। इस छोटे से संदेश ने मुझे हिला दिया। स्वामी विवेकानंद भारत की महान विभूति हो गये हैं। उन्होंने कुल 40 साल की आयु पाई। जब 30 वर्ष की आयु में उस युवा सन्यासी ने शिकागो धर्म सम्मेलन में अमरीकियों और यूरोपवासियों को माई ब्रदर्स एण्ड सिस्टर्स कहकर पुकारा तो सम्पूर्ण संसार की आत्मा आनंद से झूम उठी थी। वह पहला दिन था जब संसार ने भारत की आत्मा के मधुर संगीत की झंकार सुनी थी। उससे पहले हिन्दुस्तान का कोई भी आदमी, दंभी अमरीकियों को भाई–बहिन कहकर नहीं पुकार सका था। तब गोरी चमड़ी वाले, काली चमड़ी वालों को अपना दास मानते थे। लेडीज और जेंटलमेन के स्थान पर भाई–बहिन का सम्बोधन उनके लिये नया था। विवेकानंद, जो भारत के गौरव को संसार में हिमालय की तरह ऊँचा स्थान दिलवा गये, उन्हें यदि यह कहना पड़ा कि मैं भी लोगों पर हँसता हूँ क्योंकि वे सब एक जैसे हैं, तो इसके निश्चय ही गंभीर अर्थ हैं। यह बात जानकर हमें रो पड़ना चाहिये कि विवेकानंद हम पर हँसते थे!
क्या भारत के लोग सचमुच ऐसे हैं जिन पर हँसा जाये। हँसे तो अंग्रेज भी थे 1947 में यह सोचकर कि देखो इन हतभागी हिन्दुस्तानियों को, जो हम जैसे योग्य शासकों को इस देश से भगा रहे हैं। हमने इन्हें कायर और षड़यंत्री राजाओं, नवाबों और बेगमों के चंगुल से आजाद करवाकर नवीन शासन व्यवस्थाएं दीं। हमने इन्हें रेलगाड़ी, सड़क, पुल, टेलिफोन, बिजली, सिनेमा, अस्पताल, बैंक और स्कूल दिये और ये हमें भगा रहे हैं ! अंग्रेजों को पूरा विश्वास था कि एक दिन हिन्दुस्तानी अपने इस अपराध के लिये पछतायेंगे और हमें हाथ जोड़कर वापस बुलायेंगे। एक–एक करके 62 साल बीत चुके। हमें आज तक अंग्रेजों की याद नहीं आई। भारत की रेलगाडि़याँ, सड़कें, पुल, टेलिफोन, बिजली, सिनेमा, अस्पताल, बैंक और स्कूल दिन दूनी, रात चौगुनी गति से बढ़कर आज देश के कौने–कौने में छा चुके हैं। देश आगे बढ़ा है। सम्पन्नता आई है, हमारी आंखों के सामने, मध्यमवर्ग बैलगाडि़यों से उतरकर कारों में आ बैठा है। आलीशान मॉल, फाइव स्टार होटलों और हवाई जहाजों में पैर धरने की जगह नहीं बची है। तो क्या फिर भी हम इसी लायक बने हुए हैं कि हम पर हंसा जाये!
जवाहरलाल नेहरू, जिन्होंने अपने हाथों से हिन्दुस्तान को हिन्दुस्तान बनाया, वे भी एक दिन हम पर यह कहकर हंसे थे– लोग कारों में चलते हैं किंतु उनमें बैलगाडि़यों में चलने की तमीज नहीं है। कबीर भी हम पर यह कहकर हँसते रहे थे– पानी में मीन पियासी, मोहे सुन–सुन आवत हाँसी ! किंतु कबीर को यह कहकर रोना भी पड़ा था– सुखिया सब संसार है, खावै और सोवे, दुखिया दास कबीर है, जागै और रौवे। वस्तुत: देखा जाये तो विवेकानंद, जवाहरलाल नेहरू और कबीरदास एक ही बात पर हँस और रो रहे हैं और वह बात यह है कि हम केवल अपने सुख और स्वार्थों की पूर्ति तक ही सीमित होकर रह गये हैं। हमें कोई अंतर नहीं पड़ता इस बात से कि हमारे किसी कृत्य से समाज के दूसरे लोगों को कितनी चोट पहुंच रही है! ऋषियों की संतान होने का दावा करने वाले भारतीय, भौतिक उपलब्धियों के पीछे पागल होकर, एक दूसरे के पीछे लट्ठ लेकर भाग रहे हैं। इसी कारण हम विवेकानंद को एक जैसे दिखाई देते थे और इसी कारण कबीर हमें देखकर रातों को जागते और रोते थे।
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