Tuesday, December 29, 2009

वह लड़की जैकेट क्यों उतारती है ?

जोधपुर ने पूरे देश को नया संदेश दिया है वह बधाई का पात्र है। जिस राष्ट्रीय संगठन के नेतृत्व में देश ने आजादी की लड़ाई लड़ी, उस संगठन के 125 वें स्थापना दिवस पर आयोजित समारोह में एक नृत्यांगना ने नृत्य करते-करते अपनी जैकेट उतारी ही थी कि वयोवृद्ध और अनुभवी नेताओं ने उस गीत और नृत्य को बंद करवा दिया और नृत्यांगना को मंच से नीचे उतार दिया। ऐसा देश में पहली बार हुआ है और सचमुच उल्लेखनीय हुआ है।
ये भारत की संस्कृति नहीं है कि सार्वजनिक स्थलों पर ऐसे भौण्डे नृत्य हो, किसी समय समाज का हिस्सा रहे नौटंकी घरों, कोठों और खेल-तमाशों में ऐसी बातें होती रही होंगी किन्तु आजाद भारत में सामाजिक सरोकारों वाले ऐसे सार्वजनिक कार्यक्रमों में नृत्यांगनाओं का क्या काम? विदेशों में कुछ ऐसे टीवी चैनल हैं जिनमें कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाली एंकर अथवा समाचार वाचिका कार्यक्रम अथवा समाचार वाचन के दौरान अपने शरीर के सारे कपड़े उतार फैंकती है। ऐसा वह अपने चैनल की टीआरपी बढ़ाने के लिए करती है। भारत में भी आज टीआरपी बढ़ाने के नाम पर बहुत कुछ हो रहा है।
सार्वजनिक कार्यक्रमों में क्रिकेट के खिलाड़ियों को बुलाने, फिल्मी अभिनेताओं को बुलाकर उनसे सिनेमाई संवाद बुलवाने तथा भौण्डे नृत्य आयोजित करवाने के पीछे आयोजकों में अपने कार्यक्रम की टीआरपी बढ़ाने अर्थात अधिक भीड़ खींचने की भावना निहित रहती है। लगे हाथों नृत्यांगना भी अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए नृत्य के दौरान जैकेट अतार देने जैसी हरकतें करती है। आजादी के बाद बिहार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से इस तरह की अपसंस्कृति का चलन आरंभ हुआ जो बढ़ता हुआ पूरे देश में कैंसर की तरह फैल गया। दक्षिण भारत आज इस मामले में सबसे आगे बढ़ गया है। जोधपुर ने इस कैंसर को उखाड़ फैंकने का रास्ता दिखाया है। आशा की जानी चाहिए कि देश के दूसरे नगर भी जोधपुर का अनुसरण करेंगे।
कार्यक्रम आयोजक तो अपनी ओर अपने कार्यक्रम की टीआरपी बढाने के लिए रामलीला जैसे धार्मिक आयोजन में क्रिकेट खिलाड़ी हरभजनसिंह को रावण का मुखौटा पहना कर सीता मैया का अभिनय कर रही नटी के साथ भौंडा और अश्लील नृत्य करवा चुके हैं। हरभजनसिंह को तो केवल पैसे से मतलब है, पूरा देश और उसकी भावनाएं जाएं भाड़ में। मेरा अभिमत है कि और चाहे जिस किसी की पैसे की भूख मिट जाए क्रिकेट के खिलाड़ियां की पैसे की भूख कभी नहीं मिटती।
देखा जाए तो नृत्य के दौरान जैकेट उतारने के लिए केवल नृत्यांगना दोषी नहीं है। हमें अपने गिरेबान में झांक कर देखना चाहिए कि आखिर नृत्यांगना नृत्य के दौरान जैकेट क्यों उतारती है? उसके लिए जिम्मेदार कौन है? नृत्यांगना अथवा हम? मैं समझता हूं कि नृत्यांगना तो नाच-गाकर अपना पेट भरती है। उसका क्या दोष, वह तो वही करेगी जिससे दर्शक प्रसन्न हो, उसे अधिक पैसे मिले और उसका रोजगार चलता रहे। दोष तो सभ्य और सुसंस्कृत माने कहलाने वाल हम लोगों का है जो उस नृत्यांगना को ऐसा भौण्डा प्रदर्शन करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, उसे ऐसा रोजगार अपनाने के लिए अधिक पैसे देते हैं। हमें जोधपुर की जनता को बधाई देनी चाहिए जो टीआरपी और भौण्डे मनोरंजन के मोहजाल से बचकर जैकेट उतारने वाली लड़की को मंच से नीचे उतार देती है।

1 comment:

  1. बहुत अच्छे आलेख के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद
    आपको नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

    ReplyDelete