Thursday, January 28, 2010

इट हैपन्स ओन्ली इन इण्डिया !

गणतंत्र दिवस पर भी अब बधाई के एस एम एस करने का फैशन चल निकला है। मेरे मोबाइल फोन पर जो ढेर सारे एस एम एस आये, उनमें से एक एस एम एस के शब्द अब तक मेरे मस्तिष्क में चक्कर काट रहे हैं। यह एस. एम. एस. मुझे जोधपुर से ही श्री राजेश शर्मा ने भेजा है जिसमें लिखा है कि हम एक ऐसे मजाकिया देश में रहते हैं जिसमें पुलिस या एम्बुलेंस से पहले पिज्जा घर पहुंचता है और जहाँ बैंकों द्वारा एज्यूकेशन लोन पर 12 प्रतिशत किंतु कार लोन पर 8 प्रतिशत ब्याज दर ली जाती है।

वस्तुत: पिछले कुछ सालों से मैं इस बात को बार–बार दोहरता रहा हूँ कि हमारे देश का बाजारीकरण हो रहा है। बाजार हम सबको खाये जा रहा है। सारे रिश्ते, सारी संवेदनायें, मानवीय मूल्य, सामाजिक पर्व, रीति–रिवाज, हमारी गौरवशाली परम्परायें, सब पर बाजार हावी हो रहा है। गणतंत्र दिवस पर मिला यह एस. एम. एस., देश पर हावी होते जा रहे बाजारीकरण को ही व्यक्त करता है। बीड़ी के बण्डल पर गणेशजी तो पिछले कई दशकों से छपते रहे हैं, चोली के पीछे क्या है जैसे भद्दे गीत भी इस देश में डेढ़ दशक पहले करोड़ो रुपयों का व्यवसाय कर चुके हैं। अब तो परिस्थितियां उनसे भी अधिक खराब हो गई हैं।

देश में पिछले कुछ सालों में हुए स्टिंग आॅपरेशन हमारे देश में बढ़ते लालच की कहानी कहते हैं। पहले इस देश में जनसंख्या का विस्फोट हुआ, फिर लालच का भूकम्प आया और उसके तत्काल बाद बाजार में महंगाई का ज्वालामुखी फूट पड़ा। आज तक जितनी भी वैज्ञानिक प्रगति हुई है, उसे अचानक बाजार ने अपनी चपेट में ले लिया है। रेडियो, टी. वी. और पत्र–पत्रिकाओं का आविष्कार मानो बाजारू वस्तुओं के विज्ञापन दिखाने के लिये ही हुआ है ! मोबाइल फोन पर सारे दिन इस प्रकार के एसएमएस आते रहते हैं– जानिये अपने लव गुरु के बारे में। यदि आप अठारह साल या उससे अधिक उम्र के हैं, तो वयस्क चुटुकले पाने के लिये हमें एसएमएम कीजिये। तीन रुपये प्रति मिनिट में अपना भविष्य जानिये।

पत्र–पत्रिकाओं में जापानी तेल के विज्ञापनों से लेकर सिर पर बाल उगाने, दिलचस्प बातें करने के लिये महिला मित्र बनाने, अपने भविष्य का हाल जानने, कालसर्प दोष का निवारण करने जैसे विज्ञापनों की भरमार रहती है। अर्थात् धर्म, विज्ञान, अध्यात्म, ज्योतिष सब कुछ बाजार ने निगल लिये हैं।
इस देश का राष्ट्रीय खेल हॉकी है, किंतु लोग क्रिकेट के पीछे पागल हैं। शेर इस देश का राष्ट्रीय पशु है किंतु वह जंगलों से गायब हो रहा है। साड़ी इस देश की औरतों की मुख्य पोशाक है किंतु अब वह टीवी के ढेर सारे चैनलों से लेकर सिनेमा के पर्दों और सड़कों के किनारे लगे होडिं‍र्गों पर निक्कर–बनियान पहने खड़ी है। वह जननी से जनानी बनाई जा रही है और यह सब नारी मुक्ति, नारी स्वातंत्र्य और नारी सशक्तीकरण के नाम पर हो रहा है। स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के भार से अधिक उनकी पीठ पर लदे बस्ते का भार है जिसके बोझ के तले दबकर बचपन ही नहीं बच्चे भी आत्महत्या कर रहे हैं। मुझे आज तक समझ में नहीं आता कि मुंह में पान मसाला हो तो कदमों में दुनिया कैसे हो जाती है किंतु आज के भारत में कर लो दुनिया मुी में और कदमों में है जमाना जैसे वाक्य बाजारीकरण की सुनामी से निकली हुई वे उत्ताल तरंगे हैं जो हमें पैसे की ओर अंधा बनाकर बहाये ले जा रही हैं।

Wednesday, January 27, 2010

युवाओं को संवदेना विहीन बनाती है रैगिंग!

रैगिंग पाश्चात्य जीवन शैली की कुछ अत्यंत बुरी बुराइयों में से है, जिसे भारतीयों ने कुछ अन्य बुराईयों की तरहजबर्दस्ती ओढ़ लिया है। यह अपने आप में इतनी बुरी है कि हम विगत कई वर्षों से प्रयास करने के उपरांत भी इसेमहाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों से समाप्त नहीं कर पाये हैं। इसका क्या कारण है! रैगिंग के जारी रहने का सबसेबड़ा कारण स्वयं रैगिंग ही है। जो युवा एक बार रैगिंग का शिकार हो जाते हैं, उनके मन से मानवीय संवेदनाएं नष्टहो जाती हैं और वे अपनी रैगिंग का बदला दूसरे युवाओं से लेने का हर संभव प्रयास करते हैं। इसी मानसिकता केचलते रैगिंग को समाप्त नहीं किया जा सका है।

भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय ने देश के समस्त शिक्षण संस्थाओं को हिदायत दी है कि वे अपनीसंस्थाओं को रैगिंग से मुक्त रखें। इन आदेशों के परिप्रेक्ष्य में अधिकांश शिक्षण संस्थाओं में रैगिंग के विरुध्द कुछकदम भी उठाये हैं किंतु रैगिंग के शिकार हो चुके युवाओं के क्रूर व्यवहार के कारण रैगिंग बदस्तूर जारी है। यहबुराई तकनीकी, व्यावसायिक एवं चिकित्सा शिक्षण संस्थाओं में कैंसर का रूप ले चुकी है।

विगत वर्ष भी देश के अनेक शहरों में स्थित शिक्षण संस्थाओं में नवीन प्रवेश लेने वाले बच्चों को रैगिंग की कालीछाया ने डस लिया। कई बच्चे हमेशा के लिये शिक्षण संस्था छोड़कर चले गये तो कुछ बच्चों को प्राणों से भी हाथधोने पड़े। जो छात्र पिछली साल रैगिंग का शिकार हुए थे अब वही छात्र अपनी रैगिंग का बदला लेने के लिये नयेछात्रों का बड़ी क्रूर मानसिकता के साथ स्वागत करने को उत्सुक दिखायी देते हैं।

रैगिंग के दौरान बच्चों के साथ गाली-गलौच तथा मारपीट की जाती है जिसके साथ तर्क दिया जाता है कि इससेबच्चे बोल्ड बनेंगे और उनका दब्बूपन जाता रहेगा। यह तर्क सभ्य समाज में किसी भी समझदार व्यक्ति के गलेउतरने वाला नहीं है। गाली, लात और घूंसे खाकर आदमी बोल्ड कैसे बनेगा? ऐसे व्यक्ति के भीतर तो एक ऐसीसहमी हुई कुण्ठित पसर्नलटी जन्म लेगी जो अपने से कमजोर लोगों पर हाथ उठाकर अपने अहम को संतुष्ट करनाचाहेगी।

अक्सर हम देखते हैं कि बात केवल गाली-गलौच या लात-घूंसों तक सीमित नहीं रहती। लड़कों के कपड़े उतरवाना, उन्हें हॉस्टल की बालकनी से रस्सी बांधकर लटका देना, धारा प्रवाह गंदी गालियां बोलने के लिये विवश करना, मुर्गेबनाना, घण्टों धूप में खड़े रखना, सिगरेट पिलाना, हीटर पर बैठने के लिये मजबूर करना जैसी क्रूर हरकतें होती हैं।आजकल तो इस तरह की शारीरिक प्रताड़ना पुलिस थानों में भी नहीं हो सकती जैसी कि शिक्षण संस्थाओं में होरही है।

तर्क यह भी दिया जाता है कि यदि रैगिंग नहीं होगी तो जूनियर बच्चे अपने सीनियर्स में घुल-मिल नहीं पायेंगे।गाली-गलौच और लात घूसों के बल पर दूसरे लोगों को अपने समूह में शामिल करना एक विचित्र तर्क जैसा लगताहै। यह तो आतंक के बल पर दोस्ती गांठने जैसा है। घुलने मिलने के लिये शालीन व्यवहार, मधुर वाणी औरपरस्पर सहयोग जैसे गुण आवश्यक होते हैं कि दर्ुव्यवहार।

रैगिंग के शिकार युवा केवल कॉलेज कैम्पस में अपने से जूनियर छात्रों की रैगिंग लेकर ही संतुष्ट नहीं होते। उनमेंसे बहुत से युवा हमेशा के लिये दूसरों के प्रति संवदेना विहीन हो जाते हैं। वे सड़क, कार्यालय, परिवार एवं रिश्तेदारीमें भी दूसरों को पीड़ित करने में सुख का आनंद अनुभव करते हैं।

यदि हम अपने बच्चों को अच्छा नागरिक, अच्छा कार्मिक, अच्छा पिता, अच्छा दोस्त और अच्छा इंसान बनानाचाहते हैं तो हमें घर से ही शुरुआत करनी होगी और बच्चों को रैगिंग से दूर रहने के लिये प्रेरित करना होगा। जिनबच्चों की रैगिंग हो चुकी है, उन्हें बारबार समझाना होगा कि जो आपके साथ हुआ, उसे बुरे स्वप्न की तरह भूलजाओ तथा स्वयं किसी की रैगिंग मत लो।

Sunday, January 24, 2010

खतरे में है बच्चों की मुस्कान!


बच्चा प्रकृति का एक सुकोमल वरदान है। उसकी मुस्कान से पूरी धरती मुस्कुराती है। उसके मुस्कुराने का अर्थ हैकि उसके आसपास सब कुछ सही घटित हो रहा है किंतु मानव सभ्यता अब उस मोड़ पर पहुंच चुकी है जहां बच्चोंकी मुस्कान खतरे में दिखायी देने लगी है। बच्चों की इस मुस्कान को खतरा गैरों से नहीं अपितु उनके अपनों से है।जो माता-पिता बच्चों के मासूम मुख पर मुस्कान बनाये रखने के लिये जिम्मेदार हैं आज वे तरक्की की अंधी दौड़में अपने बच्चों से मुस्कान छीन रहे हैं।

एक युग था जब संयुक्त परिवारों का चलन था और घर में बच्चों की पूरी फौज हुआ करती थी। इनमें से कुछ बच्चेबड़े होते थे तो कुछ छोटे। ये बच्चे आपस में खेलकूद कर एक दूसरे को सुरक्षित रखते थे। घर में मां के अतिरिक्तताई, चाची, दादी और बुआ भी होती थीं जो बच्चों की देखभाल करती थीं किंतु आज के युग में संयुक्त परिवार बिखरगये। बच्चों की संख्या भी चार-पांच से घट कर एक-दो रह गयी है। ऐसे में उनके साथ परिवार का कोई सदस्य तो खेलने के लिये उपलब्ध है और उनकी देखभाल करने के लिये।

दादी-नानी और बुआ तो दूर अब बच्चे के पास उसकी अपनी मां तक नहीं है जो उसकी देखभाल कर सके। यदिपिता चौबीस में से पंद्रह घण्टे अपने काम में व्यस्त रहता है तो मां भी अब नौकरी पर जाने लगी है। यदि वह घर मेंरहती भी है तो उसे भी दूरदर्शन के धारावाहिकों से फुर्सत नहीं। इन धारावाहिकों के कारण मां इतनी चिड़चिड़ी होजाती है कि उसे बच्चे प्रकृति का वरदान नहीं, एक जिम्मेदारी भरा बोझ दिखने लगते हैं।

संयुक्त परिवार में दादी-नानी, ताई आदि घर की कोई महिला, बच्चों को रात में सोने से पहले ऐसी कहानियाँ सुनातीथीं जो बच्चों के मनोरंजन के साथ-साथ उनका मनौवैज्ञानिक विकास करने के लिये आवश्यक थीं। रामायण, महाभारत और पंचतंत्र की महान कहानियां बच्चों को दादी-नानी से ही मिल जाती थीं। इन कहानियों को सुनने सेबच्चे की केवल कल्पना शक्ति सुदृढ़ होती थी अपितु उसमें साहस का भी संचार होता था।

आज का बच्चा दादी-नानी की ममता भरी छांव से दूर, सरस कहानियों से दूर और पारिवारिक सुरक्षा के घेरे से दूरहोकर एक नयी ही दुनिया में जा पहुंचा है। स्कूल के अतिरिक्त उसका अधिक समय टेलिविजन के चैनलों परबीतता है। जहां वह या तो कार्टून फिल्में देखता है या फिर मार-धाड़ और हिंसा से भरपूर फीचर फिल्में। इन फिल्मोंका मनौवैज्ञानिक प्रभाव बच्चाें को हिंसक, एकाकी और अवसादी बना देता है। उनकी कल्पनाशीलता नष्ट होजाती है और उनमें साहस का स्थान दब्बूपन ले लेता है।

जिन बच्चों के मां-बाप अधिकतर समय अपने काम में व्यस्त रहते हैं, उनके बच्चे या तो नौकरों का आश्रय लेते हैंया फिर पड़ौसियों का। सब लोग एक जैसे तो नहीं होते किंतु फिर भी यह तय है कि तो नौकर और ही पड़ौसीबच्चों को वह प्यार या सुरक्षा दे सकते हैं जो उन्हें अपने परिवार से मिलती है। आरुषि हत्याकाण्ड समस्तमाता-पिताओं को चीख-चीख कर केवल यही संदेश देता है कि अपने बच्चों को अपनी आंखों के सामने और अपनीममता की छांव में रखो। अन्यथा आरुषियों की संख्या बढ़ने में अधिक समय नहीं लगेगा।

हाल ही में दिल्ली में एक घटना घटी। एक कामकाजी माँ ने अपनी नौकरानी की हरकतों पर नजर रखने के लियेएक गुप्त कैमरा घर में लगा दिया और स्वयं काम पर चली गयी। कैमरे में जो कुछ कैद हुआ वह दिल दहला देनेवाला था। नौकरानी गृहस्वामिनी की : माह की बच्ची को दूध पिलाने के स्थान पर उसे पीट-पीट कर चुप करनेका प्रयास करती थी। नौकरानी ने बच्ची को इतना पीटा कि अंत में बच्ची थक-हार कर भूखी ही सो गयी।

यदि माताओं को अपने बच्चों से प्यार है और यदि परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी है कि उन्हें नौकरी करने कीआवश्यकता नहीं है, तो समय की मांग यह है कि वे नौकरी करें, अपने बच्चों के पास रहकर उनके जीवन कोसुंदर बनायें। जिन बच्चों को माँ-बाप का भरपूर प्यार मिलता है, उन बच्चों में मनोवैज्ञानिक समस्याएँ उत्पन्ननहीं होतीं। वे आगे चलकर अपने माँ-बाप का ध्यान रखते हैं और माँ-बाप का बुढ़ापा सुखी और सुंदर बनता है।

देश का कानून औरत और आदमी को बराबरी का अधिकार देता है। इस नाते औरत भी अपनी मर्जी से नौकरीकरने की उतनी ही हकदार है जितना कि आदमी किंतु औरत को नौकरी करने से पहले अपने घर-परिवार औरबच्चों की वास्तविक परिस्थिति भी तो दखनी चाहिये। यदि औरत नौकरी छोड़ने को तैयार नहीं तो आदमी कोचाहिये कि वह नौकरी छोड़कर बच्चों की परवरिश करे। उन्हें समय पर दूध, खाना, कपड़ा और सुरक्षा दे। उनकाहोमवर्क करवाये।

कानूनी रूप से आदमी का ऐसा करना सही होगा किंतु क्या सामाजिक और भौतिक स्तर पर यह व्यवहार्य होगा! यह सोचना परिवार के सदस्यों का काम है। कोई दूसरा यह तय नहीं कर सकता कि आदमी या औरत में से कौननौकरी करे और कौन घर पर रहे! हाँ समस्त माता-पिताओं से इतनी मांग करना पूरे समाज का हक है कि बच्चोंको नौकरों के भरोसे छोड़कर उनकी मुस्कान छीनें।


Saturday, January 23, 2010

गंदी हो रही है बच्चों की भाषा!

पाश्चात्य दार्शनिकों का मानना है कि बच्चे जिस समय दुनिया में जन्म लेते हैं उस समय उनका मस्तिष्क एककोरी स्लेट के समान होता है जिसमें कोई संदेश नहीं लिखा हुआ होता। बच्चा धरती पर आने के बाद संदेशों कोपढ़ना सीखता है, उन्हें अपने मस्तिष्क में स्टोर करता है, उनका विश्लेषण करता है और फिर स्वयं उन संदेशों द्वारासंचालित होने लगता है। भारतीय के अनुसार बच्चों का मस्तिष्क कोरी स्लेट के समान नहीं होता, उसमें कूछ कूटसंदेश विकार, आकार और संस्कार के रूप में भरे हुए होते हैं। उदाहरण के रूप में हम जन्म लेकर धरती पर खड़ेहोते हुए बकरी के बच्चे को देख सकते हैं। बकरी का बच्चा जन्म लेने के पांच सात मिनट बाद ही मां के स्तनों कीतरफ बढ़ने लगता है और थोड़े ही प्रयास में दूध पीने में सफल हो जाता है। ऐसा कैसे संभव हो पाता है?

इस घटना को इस तरह समझा जा सकता है कि बकरी का बच्चा अपने साथ तीन कूट संदेश लेकर धरती पर आताहै। पहला है विकार जिसके कारण उसे भूख का अनुभव होता है, दूसरा है आकार जिसके बल पर वह यह जान पाताहै कि दूध कहां मिलेगा और कितनी ऊंचाई पर मिलेगा, तीसरा कूट संदेश है संस्कार, जिसके बल पर बकरी काबच्चा यह जाना पाता है कि दूध को मां के स्तन से निकालकर पेट तक कैसे पहुंचाया जायेगा।

अब यदि बकरी के बच्चे की दूध पीने की प्रक्रिया में कोई बाधा उत्पन्न की जाये तो बकरी का बच्चा अपने आप कोदूसरी परिस्थिति में ढालने का प्रयास करेगा। यदि उसकी मां को बच्चे के जन्मते ही वहां से हटा कर बच्चे के मुंह मेंदूध की बोतल का निपल लगा दिया जाये तो बकरी का बच्चा कुछ अभ्यास के बाद दूध की बोतल से दूध पीना सीखजायेगा और वह अपनी मां को भूल जायेगा।
संसार में समस्त प्राणियों के बच्चे लगभग इसी प्रक्रिया से इस संसार से अपना तारतम्य बैठाते हैं। जिस समय वेकोई नया विचार ग्रहण करते हैं उस समय उन्हें यह ज्ञात नहीं होता कि वह विचार अच्छा है या बुरा किंतुपरिस्थिति, अभ्यास और अनुभव उसे निर्णय लेना सिखा देते हैं कि क्या ग्रहण किया जाये और क्या त्याग दियाजाये।

आजकल हमारे देश में कुछ ऐसे देशी-विदेशी चैनलों का प्रसारण आरंभ हुआ है जो दुनिया के अन्य देशों कीभाषाओं में बनने वाली फिल्मों की हिन्दी भाषा में डबिंग करके उन्हें भारत में प्रसारित करते हैं। ऐसे चैनलों मेंयूटीवी बिंदास, सैट मैक्स तथा स्टार गोल्ड आदि के नाम लिये जा सकते हैं। इन चैनलों पर प्रसारित होने वालीफिल्मों में गंदे, फूहड़ और अश्लील संवादों का हिन्दी अनुवाद अत्यंत चतुराई से किया जाता है जिनमें वर्जित शब्दोंका प्रयोग तो नहीं किया जाता किंतु उन शब्दों का संकेत अभद्रता और अश्लीलता की ओर होता है। उदाहरण देखें- तेरी फट गयी क्या? वो मुझे रोज चेपती है। मैं तेरी मारूंगा। तेरी चॉप हो गयी। यहां क्या घण्टा दिखेगा। तेरी मांका... यद्यपि इन शब्दों को यहाँ लिखते समय मुझे शर्म रही है किंतु इन्हें लिखे बिना मैं अपनी बात कैसे समझासकता हूँ!

बच्चों को नहीं मालूम कि ये संवाद किस पृष्ठभूमि से लिये गये हैं और उनके वास्तविक अर्थ क्या हैं? वे तो बसबार-बार सुने हुए शब्दों को दोहराते हैं। बाद में ये संवाद जीवन भर के लिये उनकी भाषा का हिस्सा बन जायेंगे।बहुचर्चित फिल्म मुन्ना भाई एम बी बी एस में भी कुछ ऐसे ही आधे उधूरे और गंदे वाक्य बोले गये थे। ये संवादऔर किसी ने नहीं अपितु स्वयं फिल्म के नायक संजय दत्त ने बोले थे।

एक दिन मेरी पुत्री ने अंग्रेजी में इतनी गंदी गाली बोली कि मैं हैरान रह गया। वह उस गाली का अर्थ नहीं जानतीथी। मैं उसे केवल इतना ही कह सका कि यह गंदी गाली है, शब्दों के अर्थ जाने बिना उन्हें नहीं बोलना चाहिये। उसनेमुझसे पूछा कि इसका अर्थ क्या है ? मैं केवल इतना ही कह सका कि यह गंदी गाली है। तुम्हें नहीं बोलनी चाहिये।यदि आज हमने अपने बच्चों की भाषा पर ध्यान नहीं दिया तो भारतीय समाज को उसके गंभीर परिणाम भुगतनेपड़ेंगे।

Tuesday, January 19, 2010

संभावना सेठ और राखी सावंत के सामाजिक सरोकार

यह आलेख मैंने कुछ समय पूर्व लिखा था। जिसे दैनिक नवज्योति ने मेरे ब्लॉग में प्रकाशित किया था। जो पाठक इसे नहीं पढ़ पाये थे, उनकी सुविधा के लिये मैं इसे फिर से इस ब्लॉग में प्रकाशित कर रहा हूँ।

राज्य के सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशक डॉ। अमरसिंह राठौड़ अपनी विगत जोधपुर यात्रा के दौरान नगर के प्रबुद्ध नागरिकों, बुद्धिजीवियों, मीडिया प्रतिनिधियों और उद्योगपतियों को सम्बोधित कर रहे थे। अपने उद्बोधन में उन्होंने एक बड़ी जोरदार बात कही कि आज हमारे देश को सर्वाधिक चिंता संभावना सेठ और राखी सावंत की है। उन्होंने लोगों से सवाल पूछा कि संभावना सेठ और राखी सावंत का सामाजिक सरोकार क्या है? आखिर उन पर अखबारों और मैगजीनों के लाखों पृष्ठ खर्च किये जा चुके हैं। इस देश के करोड़ों नागरिकों ने उन्हें टी वी के विभिन्न चैनलों पर देखते हुए न जाने कितने घण्टे खराब कर दिये हैं। ऐसा है क्या उन दोनों में जो देश की इतनी सम्पत्ति, संसाधन और समय उनकी अधनंगी तस्वीरों, उनके फूहड़ कारनामों और उनके अरुचिकर संवादों पर न्यौछावर कर दिये गये!


डॉ। अमरसिंह ने यह भी पूछा कि आज हमारा सरोकार समाज की दो चार उन औरतों से ही क्यों रह गया है जो कपड़े पहनना नहीं चाहतीं, उस बड़े समाज से क्यों नहीं है जिसमें औरतों के पास पहनने के लिये कपड़े ही नहीं हैं। ऐसा लगता है जैसे हमारा सरोकार सिने तारिकाओं की अधनंगी तस्वीर, क्रिकेट के मैच और भ्रष्टाचार की चटखारे भरी खबर के अतिरिक्त और किसी चीज से नहीं रह गया है। माना कि देश में भ्रष्टाचार और अपराध भी हैं जिन्हें नहीं होना चाहिये किंतु हर समय उन्हीं की बातें करने से लोगों में हताशा फैलती है। देश में ईमानदार, मेहनतकश और देशभक्त लोग भी तो हैं, वे भी हमारी चर्चाओं में सम्मिलित होने चाहिये। देश में सामाजिक समस्याऐं भी तो हैं। सिनेमा, क्रिकेट, भ्रष्टाचार और अपराध के साथ उन पर भी बात होनी चाहिये।

डॉ। राठौड़ की बातों को पारदर्शी करके देखना हो तो दीपक महान का वक्तव्य भी जान लेना चाहिये। दीपक सामाजिक विषयों की डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के सुप्रसिद्ध निर्माता निर्देशक हैं। उन्होंने जयपुर में हुए देश के सबसे बड़े अग्निकाण पर टिप्पणी की है कि जब तक समाज अपने दायित्व को भूलकर आईपीएल, बिगबॉस और शादियों में सीमित होकर रहेगा, इस तरह के हादसे होते रहेंगे। डॉ. राठौड़ के उद्बोधन में जो व्यग्रता है उसे इस अग्निकाण्ड के परिप्रेक्ष्य में भलीभांति समझा जा सकता है।

संभावना सेठ और राखी सावंत समाज के जिस वर्ग से सम्बन्ध रखती हैं, उस वर्ग की औरतों को मुँह अंधेरे उठकर नगर की सड़कों पर कचरा नहीं बीनना पड़ता। यदि उन्हें यह काम दे दिया जाये तो वे कर भी नहीं सकेंगी किंतु जो औरतें आज मुँह अंधेरे कचरा बीन रही हैं, उन्हें यदि क्रीम पाउडर से पोतकर संभावना सेठ और राखी सावंत का काम दे दिया जाये तो इसमें कोई संदेह नहीं कि दो–चार दिन के प्रशिक्षण के बाद उनके लिये वह कोई बड़ा काम नहीं होगा।

डॉ. राठौड़ के भाषण को मैं अपनी दृष्टि से देखता हूँ तो मुझे लगता है कि संभावना सेठ और राखी सावंत इस युग की ऐसी व्यावसायिक मजबूरियां हैं जो लिज हर्ले और दीपा मेहता की तरह समाज को अपने शरीर के अधनंगेपन और व्यर्थ के लटके–झटके में उलझाये रखने में माहिर हैं। वे मीडिया में सुर्खियां बनकर छायी रहती हैं, जिनके बल पर वे भारतीय संस्कृति को ताल ठोक कर चुनौती देती हैं और अधनंगेपन के सम्मोहन में बंधा भारतीय समाज उनके लिये बड़े बाजार का कार्य करता है। इस सम्मोहन का परिणाम यह होता है कि कुछ ही दिनों में वे सैंकड़ों करोड़ रुपयों की स्वामिनी बन जाती हैं और टी. वी. के पर्दे के सामने बैठा आम भारतीय छोटे पर्दे की चकाचौंध और अधनंगी देह के सम्मोहन में खोया रहता है।

Monday, January 18, 2010

रूपाजीवाएँ सदियों से हैं किंतु वे कभी मुखर नहीं रहीं!


लंदन के लेगटम संस्थान और आब्जर्वर रिसर्च फाउण्डेशन ने कौनसे भारत की प्रशंसा की है? क्या उस भारत की जिसमें पाश्चात्य संस्कृति में आकण्ठ डूबा हुआ धनी समाज रहता है और परिवारों ने मुक्त यौनाचरण व्यवस्था को स्वीकार कर लिया है? या उस भारत की जहाँ आज भी कुलवधुओं की आँखों में लज्जा और शर्म का बोध होता है? मैं समझता हूँ लेगटम संस्थान ने दूसरी तरह के भारत की प्रशंसा की है जिसमें कुलवधू लज्जा का गहना पहनकर अपने ससुराल आती है और परिवार को अपनी उपस्थिति की सौंधी गंध से भरकर निहाल कर देती है। देहयष्टि, रूप और यौवन का व्यवसाय करने वाले लोग इस सौंधी गंध को कुचल कर नष्ट करके समाज में नंगापन घोल देना चाहते हैं।


आज से कुछ वर्ष पूर्व जब बेबी खुशबू युवा हो गई तो उसने टी।वी। चैनलों पर बयान दिया कि प्रतिस्पर्धा और आधुनिकता के इस युग में भारतीय समाज नारी से कौमार्य की अपेक्षा न करे। यह समझने की आवश्यकता है कि खुशबू ने ऐसा दर्शनशास्त्र क्यों बघारा? नि:संदेह उसने फिल्मों में काम पाने के लिये फिल्म निर्माताओं का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के उद्देश्य से ऐसी बचकाना हरकत की।

हाल ही में परफैक्ट इण्डियन ब्राइड कही जाने वाली अमृता राव ने भी जब देखा कि फिल्म निर्माता उसे ठण्डी नायिका के रूप में देख रहे हैं और उसे कम फिल्में मिल रही हैं तो उसने बयान दे मारा कि शादी के पहले सैक्स में बुराई नहीं। ये सारे प्रयास एक खास व्यावसायिक मानसिकता की देन हैं जो हमें हमारे बाप दादों की उज्ज्वल संस्कृति से विमुख करते हैं। लाफ्टर शो के माध्यम से पूरे भारत में बेशर्मी और वाचालता का प्रसार किया गया। बिग बॉस जैसे सीरियल उसकी अगली कड़ी हैं। बिग बॉस में दिखाये गये घर और उसके सदस्य किस भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक परिवेश को प्रदर्शित करते हैं! राष्ट्र–व्यापी बेशर्मी के साथ भारत के एक सौ सोलह करोड़ लोगों को बेहद फूहड़, अश्लील और घटियापन परोसा जा रहा है। राखी सावंत और संभावना सेठ जैसी कलाकारों ने इस फूहड़पन के माध्यम से भले ही सैंकड़ों करोड़ रुपये कमा लिये होंगे किंतु भारतीय समाज और परिवारों के लिये उनकी वाचालता ने विकृतियाँ परोसने का ही काम किया है।


किसी भी सभ्य समाज को मनोरंजन प्रधान कार्यक्रमों के विरुद्ध नहीं होना चाहिये। मैं भी नहीं हूँ। कालिदास ने कहा है कि आदमी उत्सव–प्रिय है, उत्सवों का आयोजन होते रहना चाहिये किंतु टी वी पर मनोरंजन के नाम पर जो फूहड़ता, भद्दापन और अश्लीलता परोसी जा रही है, उससे देश की उत्सव प्रधान संस्कृति, सामाजिक परिवेश तथा पारिवारिक संरचना को नुक्सान पहुँच रहा है। आम आदमी का भोलापन और उसकी सरलता नष्ट हो रही है। उसमें कांईयाँपन, वाचालता और चालाकी की प्रवृत्ति बढ़ रही है।

जब कुछ लोग इस फूहड़ता और अश्लीलता का विरोध करते हैं तो उन्हें हिन्दुस्तानी तालिबान कहकर उनकी आवाज दबाने का प्रयास किया जाता है। रूपाजीवाएँ भारत में सदैव रही हैं किंतु वे कभी इतनी मुखर नहीं रहीं जितनी कि आज हैं। नि:संदेह लेगटम संस्थान और आब्जर्वर रिसर्च फाउण्डेशन ने इन रूपाजीवाओं के रूप सौंदर्य पर रीझ कर भारतीय समाज और परिवारों की प्रशंसा नहीं की है।

Saturday, January 16, 2010

भारत की पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था को बचाना होगा!

लेगटम प्रोस्पेरिटी रिपोर्ट ने भारत को सामाजिक व्यवस्था के मामले संसार का पहले नम्बर का देश बताया है।भारतीय समाज की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि भारत का समाज कम खर्चीला समाज रहा है। घर, परिवार औरबच्चों के साथ जीना, गली मुहल्ले में ही मिल जुल कर उत्सव मनाना, हरि भजन में समय बिताना, कम कमानाऔर कम आवश्यकतायें खड़ी करना, भारतीय सामाजिक जीवन का आधार रहा है। इसके विपरीत पश्चिमी देशों कीजीवन शैली होटलों में शराब पार्टियां करने, औरतों को बगल में लेकर नाचने, महंगी पोशाकें पहनने और अपनेखर्चों को अत्यधिक बढ़ा लेने जैसे खर्चीले शौकों पर आधारित रही है।

आजकल टी वी चैनलों और फिल्मों के पर्दे पर एक अलग तरह का भारत दिखाया जा रहा है जो हवाई जहाजों मेंघूमता है, गर्मी के मौसम में भी महंगे ऊनी सूट और टाई पहनता है तथा चिपचिपाते पसीने को रोकने के लियेचौबीसों घण्टे एयरकण्डीशनर में रहता है। टीवी और सिनेमा के पर्दे पर दिखने वाला भारत वास्तविक भारत नहींहै।

वह भारत की एक नकली तस्वीर है जो आज के बाजारवाद और उपभोक्तवाद की देन है। आज भी भारत का बहुतबड़ा हिस्सा दिन भर धूप भरी सड़कों पर फल-सब्जी का ठेला लगाता है, सड़क पर बैठकर पत्थर तोड़ता है, पेड़ केनीचे पाठशालायें लगाता है और किसी दीवार की ओट में खड़ा होकर पेशाब करता है। भारत के सकल घरेलू उत्पादमें इन लोगों का योगदान एयरकण्डीशनर में छिपकर बैठे लोगों से किसी प्रकार कम नहीं है। इन्हीं लोगों कीबदौलत कम खर्चीले समाज का निर्माण होता है। यदि इन सब लोगों को एयर कण्डीशनर में बैठने की आवश्यकतापड़ने लगी तो धरती पर तो एक यूनिट बिजली बचेगी और बिजली बनाने के लिये कोयले का एक भी टुकड़ाबचेगा। लेगटम प्रोस्पेरिटी इण्डेक्स में भारतीय समाज की इन विशेषताओं को प्रशंसा की दृष्टि से देखा गया है।

टी वी सीरियलों में भी एक अलग ही तरह का भारत दिखाया जा रहा है जहाँ बहुएं सास के विरुध्द और सास बहुओंके विरुध्द षड़यंत्र कर रही हैं। भाई एक दूसरे की इण्डस्ट्री पर कब्जा करने की योजनाएं बना रहे हैं। बेटियां अपनेपिता को शत्रु समझ रही हैं और ननद भाभियां एक दूसरे की जान की दुश्मन बनी हुई हैं। यह कैसा भारत है? कहाँरहता है यह?

आजकल एक भारत और उभर रहा है जिसने इन सारे भारतों को पीछे छोड़ दिया है। कुछ वर्ष पहले दीपा मेहता नेसिनेमा दर्शकों की जेब ढीली करने के लिये भारतीय महिलाओं में समलैंगिकता की फायर लगाने का प्रयास किया।इसी बीच बेबी खुशबू युवा हो गईं और उन्होंने फिल्म बनाने वालों का ध्यान आकर्षित करने के लिये बयान दियाकि प्रतिस्पर्धा और आधुनिकता के इस युग में भारतीय समाज नारी से कौमार्य की अपेक्षा करे। परफैक्टइण्डियन ब्राइड मानी जाने वाली अमृता राव ने जब देखा कि फिल्म निर्माता ठण्डी नायिका के रूप में देख रहे हैं तोउसने हॉट बनने के लिये बयान दे मारा कि शादी के पहले सैक्स में बुराई नहीं।

हमें लंदन के लेगटम संस्थान और ऑब्जर्वर रिसर्च फाउण्डेशन का आभारी होना चाहिये कि उन्होंने इतने सारेभारतों के बीच असली भारत को ढूंढ निकाला और सामाजिक मूल्यों के पैमाने पर भारत को सबसे पहला स्थानदिया है। हमारा भी यहर् कत्ताव्य बनता है कि हम नकली भारतों की तरफ चुंधियाई हुई ऑंखों से देखना छोड़करअसली भारत की तरफ देखना आरंभ करें।

Thursday, January 14, 2010

पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था ही हमारी पूंजी है!


लंदन की लेगटम प्रोस्पेरिटी रिपोर्ट में भारत की परिवारिक व्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था की प्रशंसा में बहुत कुछ कहा गया है। वस्तुत: भारत की परिवार व्यवस्था संसार की सबसे अच्छी परिवार व्यवस्था रही है। भारतीय पति–पत्नी का दायित्व बोध से भरा जीवन पूरे परिवार के लिये समर्पित रहता है। इसी समर्पण से भारतीय परिवारों को समृद्ध और सुखी रहने के लिये आवश्यक ऊर्जा मिलती है। जबकि आर्थिक रूप से समृद्ध देशों में पति–पत्नी एक बैरक में रहने वाले दो सिपाहियों की तरह रहते हैं, जो दिन में तो अपने–अपने काम पर चले जाते हैं, रात को दाम्पत्य जीवन जीते हैं और उनके छोटे बच्चे क्रैश में तथा बड़े बच्चे डे बोर्डिंग में पलते हैं। यह ठीक ऐसा ही है जैसे मेंढक अपने अण्डे पानी में छोड़कर आगे बढ़ जाता है, वे जानें और उनका भाग्य जाने।

पश्चिमी देशों की औरतें अपने लिये अलग बैंक बैलेंस रखती हैं। उनके आभूषणों पर केवल उन्हीं का अधिकार होता है। आर्थिक रूप से पूरी तरह स्वतंत्र और आत्मनिर्भर होने के कारण उनमें अहमन्यता का भाव होता है और वे अपने पहले, दूसरे या तीसरे पति को तलाक देकर अगला पुरुष ढूंढने में अधिक सोच विचार नहीं करतीं। यही कारण है कि आज बराक हुसैन ओबामा का कोई भाई यदि केन्या में मिलता है तो कोई भाई चीन में। जब से ओबामा अमरीका के राष्ट्रपति बने हैं, तब से दुनिया के कई कौनों में बैठे उनके भाई बहिनों की लिखी कई किताबें बाजार में आ चुकी हैं। यही राष्ट्रपति बिल क्लिण्टन के मामले में भी यही हुआ था।

जापानी पत्नियाँ संसार भर में अपनी वफादारी के लिये प्रसिद्ध हैं। फिर भी जापान में एक कहावत कही जाती है कि पत्नी और ततभी (चटाई) नई ही अच्छी लगती हैं। यही कारण है कि जापानी परिवारों में बूढ़ी औरतों को वह सम्मान नहीं मिलता जो भारतीय परिवारों में मिलता है। भारत में स्त्री की आयु जैसे जैसे बढ़ती जाती है, परिवार में उसका सम्मान भी बढ़ता जाता है, उसके अधिकार भी बढ़ते जाते हैं। भारत में स्त्रियां धन–सम्पत्ति और अधिकारों के लिये किसी से स्पर्धा नहीं करती हैं, जो पूरे परिवार का है, वही उसका है।

पारम्परिक रूप से भारतीय औरत अपने लिये अलग बैंक खाते नहीं रखती है, उसके आभूषण उसके पास न रहकर पूरे परिवार के पास रहते हैं। वह जो खाना बनाती है, उसे परिवार के सारे सदस्य चाव से खाते हैं, बीमार को छोड़कर किसी के लिये अलग से कुछ नहीं बनता। जब वह बीमार हो जाती है तो घर की बहुएं उसके मल मूत्र साफ करने से लेकर उसकी पूरी तीमारदारी करती हैं। बेटे भी माता–पिता की उसी भाव से सेवा करते हैं जैसे मंदिरों में भगवान की पूजा की जाती है।

पाठक कह सकते हैं कि मैं किस युग की बात कर रहा हूँ। मैं पाठकों से कहना चाहता हूँ कि भारत के 116 करोड़ लोगों में से केवल 43 करोड़ शहरी नागरिकों को देखकर अपनी राय नहीं बनायें, गांवों में आज भी न्यूनाधिक यही स्थिति है। शहरों में भी 80 प्रतिशत से अधिक घरों में आज भी परम्परागत भारतीय परिवार रहते हैं जहाँ औरतें आज भी संध्या के समय सिर पर पल्ला रखकर तुलसी के नीचे घी का दिया जलाती हैं और घर की बड़ी–बूढि़यों से अपने लम्बे सुहाग का अशीर्वाद मांगती हैं। ऐसी स्थिति में यदि लेगटम प्रोस्पेरिटी रिपोर्ट ने सामाजिक मूल्यों के मामलें में भारत को संसार का पहले नम्बर का देश बताया है तो इसमें कौनसे आश्चर्य की बात है!

Tuesday, January 12, 2010

अधिक पूंजी मनुष्य की सामाजिकता को नष्ट कर देती है!


लंदन के लेगटम संस्थान और आब्जर्वर रिसर्च फाउण्डेशन ने भारत को उसके पड़ौसी देशों अर्थात् चीन, पाकिस्तान, बर्मा, बांगलादेश, श्रीलंका, अफगानिस्तान और नेपाल की तुलना में अच्छी प्रशासनिक, सामाजिक एवं पारिवारिक स्थिति वाला देश ठहराया है। इससे हमें फूल कर कुप्पा होने की आवश्यकता नहीं है। कई बार अकर्मण्य पुत्र अपने पूर्वजों द्वारा अर्जित सम्पदा के बल पर धनी कहलवाने का गौरव प्राप्त करते हैं, ठीक वैसी ही स्थिति हमारी भी हो सकती है। भारतीय समाज और परिवार के भीतर सब–कुछ ठीक नहीं चल रहा है। भारतीय समाज और परिवार अब तक तो पूर्वजों द्वारा निर्धारित नैतिक मूल्यों के दायरे में जीवन जीते रहे हैं और सुख भोगते रहे हैं किंतु जब नैतिक मूल्यों का स्थान पूंजी ले लेगी, तब भारतीय समाज और परिवारों के भीतर कष्ट और असंतोष बढ़ते चले जायेंगे।

कुछ लोग हैरान होकर पूछते हैं कि कम पूंजी में सुखी कैसे रहा जा सकता है? उनके विचार में तो मनुष्य के पास जितनी अधिक पूंजी बढ़ेगी, उतना ही वह सुखी रहेगा। लोगों के चिंतन में आई यह विकृति हमारी शिक्षा पद्धति का दोष है। भारतीय सामाजिक व्यवस्था और परिवार नामक संस्था के विरुद्ध, राष्ट्र के भीतर और बाहर जो षड़यंत्र रचे गये हैं, उनका ही परिणाम है कि अधिकांश भारतीय परिवार पूंजी के पीछे पागल होकर बेतहाशा दौड़ पड़े हैं।

संसार में मनुष्य ही एकमात्र प्राणी नहीं है, करोड़ों तरह के जीव जंतु हैं। उनमें से कोई भी पूंजी का निर्माण नहीं करता, संग्रह भी नहीं करता। फिर भी वे ना–ना प्रकार के श्रम करते हैं और भोजन के रूप में आजीविका प्राप्त करते हैं। बिना पूंजी के वे प्रसन्न कैसे रहते हैं, क्या केवल भोजन प्राप्त कर लेना ही उनके लिये एकमात्र प्रसन्नता है? हमारा सनातन अनुभव और नूतन विज्ञान दोनों ही बताते हैं कि पशु–पक्षियों, कीट पतंगों, सरीसृपों और मछलियों में भी सामाजिक जीवन होता है जिसके आधार पर वे एक दूसरे का सहारा बनते और सुखी रहतेे हैं। यह सही है कि पूंजी का निर्माण किये बिना मनुष्य का सामाजिक जीवन लगभग असंभव है किंतु यह भी सही है कि अधिक पूंजी का विस्तार मनुष्य की सामजिकता को नष्ट कर देता है।

श्रीमती इंदिरा गांधी लगभग 17 साल तक भारत की प्रधानमंत्री रहीं। उन्होंने देश के संविधान की भूमिका में भारत के नाम के साथ ‘‘समाजवादी’’ शब्द जोड़ा (न कि ‘‘पूंजीवादी’’)। इसीसे अनुमान लगाया जा सकता है कि वे स्वतंत्र भारत के सामाजिक ढांचे को सुरक्षित रखने के लिये चिंतित थीं और उन्हें ज्ञात था कि दुनिया हमारे समाजिक ढांचे को चोट पहुंचाने के भरपूर प्रयास करेगी।

दु:ख की बात यह है कि विगत दशकों में भारत का सामाजिक ढांचा कमजोर हुआ है तथा परिवारों में टूटन बढ़ी है। आम आदमी के नैतिक बल में कमी आने से समाजिक स्तर पर यौन उत्पीड़न, बलात्कार, विवाहेत्तर सम्बन्ध, सम्पत्ति हरण, कमीशनखोरी, सड़क दुर्घटनाएं, बलवे, साम्प्रदायिक उन्माद, फतवे, आतंकवादी हमले, नकली नोटों का प्रचलन, राहजनी, सेंधमारी, चेन स्नैचिंग, नक्सलवाद आदि बुराइयों का प्रसार हुआ है। इसी तरह परिवारों के भीतर घर के सदस्यों की हत्याएँ, उत्पीड़न, तलाक, बच्चों के पलायन, मदिरापान, विषपान, आत्महत्या जैसी बुराइयों का निरंतर प्रसार हुआ है। हम भीतर ही भीतर खोखले हो रहे हैं।

यही कारण है कि लंदन के लेगटम संस्थान और आॅब्जर्वर रिसर्च फाउण्डेशन की रिपोर्ट में भारत को 104 देशों की सूची में से 47वां स्थान मिला है। यह काफी नीचा है और भय है कि आने वाले दशकों में हम 47 से और नीचे न खिसक जायें। यह सोचकर प्रसन्न होने का कोई लाभ नहीं है कि चीन को हमसे काफी नीचे, 75वां स्थान मिला है।

Sunday, January 3, 2010

बड़े लोगों का झगड़ा है थ्री ईडियट्स

मैं बड़े लोगों के झगड़े में नहीं पड़ता क्योंकि बड़े लोग जानबूझकर झगड़ा पैदा करते हैं। वे उन झगड़ों में फूंक मार-मार कर लाल-लाल ऑंच सुलगाते हैं और उस ऑंच पर अपनी ब्रेड-बटर सेकते हैं। जब ब्रेड-बटर सिक जाती है तो ये झगड़े बिना किसी अंत के चुपचाप नेपथ्य में चले जाते हैं। थ्री ईडियट्स ऐसे ही कुछ बड़े लोगों का झगड़ा है जो कि पूरा का पूरा फैब्रीकेटेड लगता है।

झगड़े का सार इस प्रकार से है- चेतन भगत नामक एक अंग्रेजी भाषा के लेखक ने ''फाइव पॉइन्ट समवन'' शीर्षक से एक उपन्यास लिखा। जितना नीरस शीर्षक इस उपन्यास का है, शायद ही इससे पहले किसी उपन्यास का रहा होगा। इस किताब का मुखपृष्ठ चेतन भगत की पत्नी ने डिजाइन किया है। इससे अधिक नीरस डिजाइन आपने अपने जीवन में नहीं देखा होगा। कवर डिजाइन पर एक छोटी सी बोतल और एक जूता बनाया गया है तथा एक छोटी सी लाइन लिखी गई है- ''व्हाट नॉट टू डू एट आई आई टी।'' इससे पूर्व उन्होंने ''टू स्टेट्स'' नामक उपन्यास पर ''व्हाट नॉट टू डू एट आई आई एम'' अंकित किया था।

जैसा कि भारत में लिखे गये अंग्रेजी साहित्य के साथ होता आया है, यह उपन्यास एक विशेष योजना के माध्यम से एक विशेष पाठक वर्ग में प्रचारित किया गया। प्रचारकों ने इस उपन्यास के मुखपृष्ठ पर आई.आई.टी. शब्द का उपयोग करके अंग्रेजी स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को अपना लक्ष्य बनाया। थोड़ी सी अवधि के बाद इस पुस्तक के जो नये संस्करण आये उनके मुखपृष्ठों पर इस पुस्तक के ''बैस्ट सेलर बुक'' होने का दावा किया गया और प्रचारित किया गया कि इस पुस्तक ने भारत में पाठकों की संख्या को दो गुना कर दिया है।

जब यह पुस्तक युवा वर्ग में अच्छी खासी लोकप्रिय हो गई तो विधु विनोद चौपड़ा का ध्यान इस ओर गया। उन्होंने चेतन भगत को रुपये देकर इसकी कहानी के राइट्स खरीद लिये। फिल्म भी बन गई किंतु इसके रिलीज होने के तीन दिन बाद चेतन भगत ने झगड़ा खड़ा किया गया कि उन्हें इस फिल्म में लेखक होने का श्रेय नहीं दिया गया। फिल्म के निर्देशक राजकुमार हिरानी कह रहे हैं कि चेतन भगत की पुस्तक ''फाइव प्वाइंट समवन'' और फिल्म ''थ्री ईडियट्स'' की कहानी में केवल पांच प्रतिशत ही समानता है जबकि चेतन भगत कह रहे हैं कि इन दोनों कहानियों में सत्तार प्रतिशत समानता है। राजकुमार हिरानी दर्शकों से अपील कर रहे हैं कि अब आप ही फैसला करें कि वास्तव में कितनी कहानी मिलती है।

इधर एक संस्था ने यह भी झगड़ा खड़ा करने का प्रयास किया है कि वैसे तो यह एक अच्छी फिल्म है किंतु इसमें रैगिंग को ग्लोरीफाई किया गया है। अजीब बात है, जो फिल्म कॉलेज स्टूडैण्ट्स को रैगिंग के रोचक तरीके सिखाती है, उसे अच्छी फिल्म कैसे कहा जा सकता है! कुल मिलाकर ये सारे झगड़े बड़े लोगों के हैं जो फिल्म को प्रोमोट करने के लिये खड़े किये जा रहे हैं। यह ठीक वैसा ही भौण्डा प्रचार प्रयास है जैसा कुछ समय पहले अंग्रेजी लेखक विक्रम सेठ द्वारा स्कूली लड़कियों के सामने मंच पर बैठकर शराब पीने के बाद उसकी माँ ने यह कहकर झगड़े को बढ़ावा दिया था कि कुछ लोग चाय-कॉफी पीते हैं, मेरा बेटा शराब पीता है, इसमें बुरा क्या है। इस झगड़े ने विक्रम सेठ का नाम भारत के उन हिन्दी भाषी गांवों में पहुंचा दिया था, जहां तक वह कभी नहीं पहुंच सकता था।

Friday, January 1, 2010

क्यों है भारत विश्व में पैंतालीसवें नम्बर पर ?

लंदन के लेगटम संस्थान और आॅब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन द्वारा 79 मानकों को आधार मान कर विश्व के 104 देशों का रिपोर्ट कार्ड तैयार करवाया है उसमें भारत के लिये एक शुभ सूचना है। इन 104 देशों में विश्व की 90 प्रतिशत आबादी रहती है और इस सूची में भारत को पैंतालीसवां स्थान मिला है। सामाजिक मूल्यों के मामले में भारत को विश्व में पहले स्थान पर रखा गया है। यदि 104 देशों की सूची में से विकसित समझे जाने देशों को निकाल दें और केवल विकासशील देशों की सूची देखें तो समृद्धि के मामले में भारत को प्रथम 10 शीर्ष देशों में स्थान मिला है।

विश्व समृद्धि की सूची में भारत को 45वां स्थान मिला, यह शुभ सूचना नहीं है, शुभ सूचना यह है कि सकल विश्व को आर्थिक मोर्चे पर कड़ी चुनौती दे रहे चीन को 75वां स्थान मिला है। आगे बढ़ने से पहले बात उन मानकों की जिनके आधार पर यह रिपोर्ट कार्ड तैयार करवाया गया है। देश का सामाजिक ढांचा, परिवार व्यवस्था, मैत्री भावना, सरकार के आर्थिक सिद्धांत, उद्यमों के लिये अनुकूल वातावरण, विभिन्न संस्थाओं में लोकतंत्र, देश की शासन व्यवस्था, आम आदमी का स्वास्थ्य, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सामाजिक मूल्य और सुरक्षा आदि कुछ ऐसे महत्वपूर्ण मानक हैं जिनकी कसौटी पर भारत संसार में 45वें स्थान पर ठहराया गया है और चीन 75वें स्थान पर। भारत के अन्य पड़ौसी देशों– पाकिस्तान, बांगलादेश, अफगानिस्तान, बर्मा, श्रीलंका, नेपाल और भूटान आदि की स्थिति तो और भी खराब है। ऐसा कैसे हुआ? इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिये एक ही उदाहरण देखना काफी होगा।

पिछले दिनों जब चीन ने अपना 60वां स्थापना दिवस मनाया था तब राष्ट्रीय फौजी परेड में भाग ले रहे सैनिकों की कॉलर पर नुकीली आलपिनें लगा दी थीं ताकि परेड के दौरान सैनिकों की गर्दन बिल्कुल सीधी रहे। किसी भी नागरिक को इस फौजी परेड को देखने के लिये अनुमति नहीं दी गई थी। लोगों को घरों से निकलने से मना कर दिया गया था, बीजिंग में कफ्यू‍र् जैसी स्थिति थी। लोग यह परेड केवल अपने टी।वी। चैनलों पर ही देख सकते थे।

इसके विपरीत हर साल 26 जनवरी को नई दिल्ली में आयोजित होने वाली गणतंत्र दिवस परेड में भारत के सिपाही गर्व से सीना फुलाकर और गर्दन सीधी करके चलते हैं, हजारों नागरिक हाथ में तिरंगी झण्डियां लेकर इन सिपाहियों का स्वागत करते हैं और करतल ध्वनि से उनका हौंसला बढ़ाते हैं। यही कारण है कि कारगिल, शियाचिन और लद्दाख के बरफीले पहाड़ों से लेकर बाड़मेर और जैसलमेर के धोरों, बांगला देश के कटे फटे नदी मुहानों और अरब सागर से लेकर बंगाल की खाड़ी तक के समूचे तटवर्ती क्षेत्र में भारत के सिपाही अपने प्राणों पर खेलकर भारत माता की सीमाओं की रक्षा करते हैं। हमारी सरकार सैनिकों के कॉलर पर तीखी पिनें चुभोकर उनके कॉलर खड़े नहीं करती, देश प्रेम का भाव ही सिपाही की गर्दन को सीधा रखता है। भारत और चीन का यही अंतर हमें 45वें और चीन को 75वें स्थान पर रखा है।