Sunday, January 24, 2010

खतरे में है बच्चों की मुस्कान!


बच्चा प्रकृति का एक सुकोमल वरदान है। उसकी मुस्कान से पूरी धरती मुस्कुराती है। उसके मुस्कुराने का अर्थ हैकि उसके आसपास सब कुछ सही घटित हो रहा है किंतु मानव सभ्यता अब उस मोड़ पर पहुंच चुकी है जहां बच्चोंकी मुस्कान खतरे में दिखायी देने लगी है। बच्चों की इस मुस्कान को खतरा गैरों से नहीं अपितु उनके अपनों से है।जो माता-पिता बच्चों के मासूम मुख पर मुस्कान बनाये रखने के लिये जिम्मेदार हैं आज वे तरक्की की अंधी दौड़में अपने बच्चों से मुस्कान छीन रहे हैं।

एक युग था जब संयुक्त परिवारों का चलन था और घर में बच्चों की पूरी फौज हुआ करती थी। इनमें से कुछ बच्चेबड़े होते थे तो कुछ छोटे। ये बच्चे आपस में खेलकूद कर एक दूसरे को सुरक्षित रखते थे। घर में मां के अतिरिक्तताई, चाची, दादी और बुआ भी होती थीं जो बच्चों की देखभाल करती थीं किंतु आज के युग में संयुक्त परिवार बिखरगये। बच्चों की संख्या भी चार-पांच से घट कर एक-दो रह गयी है। ऐसे में उनके साथ परिवार का कोई सदस्य तो खेलने के लिये उपलब्ध है और उनकी देखभाल करने के लिये।

दादी-नानी और बुआ तो दूर अब बच्चे के पास उसकी अपनी मां तक नहीं है जो उसकी देखभाल कर सके। यदिपिता चौबीस में से पंद्रह घण्टे अपने काम में व्यस्त रहता है तो मां भी अब नौकरी पर जाने लगी है। यदि वह घर मेंरहती भी है तो उसे भी दूरदर्शन के धारावाहिकों से फुर्सत नहीं। इन धारावाहिकों के कारण मां इतनी चिड़चिड़ी होजाती है कि उसे बच्चे प्रकृति का वरदान नहीं, एक जिम्मेदारी भरा बोझ दिखने लगते हैं।

संयुक्त परिवार में दादी-नानी, ताई आदि घर की कोई महिला, बच्चों को रात में सोने से पहले ऐसी कहानियाँ सुनातीथीं जो बच्चों के मनोरंजन के साथ-साथ उनका मनौवैज्ञानिक विकास करने के लिये आवश्यक थीं। रामायण, महाभारत और पंचतंत्र की महान कहानियां बच्चों को दादी-नानी से ही मिल जाती थीं। इन कहानियों को सुनने सेबच्चे की केवल कल्पना शक्ति सुदृढ़ होती थी अपितु उसमें साहस का भी संचार होता था।

आज का बच्चा दादी-नानी की ममता भरी छांव से दूर, सरस कहानियों से दूर और पारिवारिक सुरक्षा के घेरे से दूरहोकर एक नयी ही दुनिया में जा पहुंचा है। स्कूल के अतिरिक्त उसका अधिक समय टेलिविजन के चैनलों परबीतता है। जहां वह या तो कार्टून फिल्में देखता है या फिर मार-धाड़ और हिंसा से भरपूर फीचर फिल्में। इन फिल्मोंका मनौवैज्ञानिक प्रभाव बच्चाें को हिंसक, एकाकी और अवसादी बना देता है। उनकी कल्पनाशीलता नष्ट होजाती है और उनमें साहस का स्थान दब्बूपन ले लेता है।

जिन बच्चों के मां-बाप अधिकतर समय अपने काम में व्यस्त रहते हैं, उनके बच्चे या तो नौकरों का आश्रय लेते हैंया फिर पड़ौसियों का। सब लोग एक जैसे तो नहीं होते किंतु फिर भी यह तय है कि तो नौकर और ही पड़ौसीबच्चों को वह प्यार या सुरक्षा दे सकते हैं जो उन्हें अपने परिवार से मिलती है। आरुषि हत्याकाण्ड समस्तमाता-पिताओं को चीख-चीख कर केवल यही संदेश देता है कि अपने बच्चों को अपनी आंखों के सामने और अपनीममता की छांव में रखो। अन्यथा आरुषियों की संख्या बढ़ने में अधिक समय नहीं लगेगा।

हाल ही में दिल्ली में एक घटना घटी। एक कामकाजी माँ ने अपनी नौकरानी की हरकतों पर नजर रखने के लियेएक गुप्त कैमरा घर में लगा दिया और स्वयं काम पर चली गयी। कैमरे में जो कुछ कैद हुआ वह दिल दहला देनेवाला था। नौकरानी गृहस्वामिनी की : माह की बच्ची को दूध पिलाने के स्थान पर उसे पीट-पीट कर चुप करनेका प्रयास करती थी। नौकरानी ने बच्ची को इतना पीटा कि अंत में बच्ची थक-हार कर भूखी ही सो गयी।

यदि माताओं को अपने बच्चों से प्यार है और यदि परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी है कि उन्हें नौकरी करने कीआवश्यकता नहीं है, तो समय की मांग यह है कि वे नौकरी करें, अपने बच्चों के पास रहकर उनके जीवन कोसुंदर बनायें। जिन बच्चों को माँ-बाप का भरपूर प्यार मिलता है, उन बच्चों में मनोवैज्ञानिक समस्याएँ उत्पन्ननहीं होतीं। वे आगे चलकर अपने माँ-बाप का ध्यान रखते हैं और माँ-बाप का बुढ़ापा सुखी और सुंदर बनता है।

देश का कानून औरत और आदमी को बराबरी का अधिकार देता है। इस नाते औरत भी अपनी मर्जी से नौकरीकरने की उतनी ही हकदार है जितना कि आदमी किंतु औरत को नौकरी करने से पहले अपने घर-परिवार औरबच्चों की वास्तविक परिस्थिति भी तो दखनी चाहिये। यदि औरत नौकरी छोड़ने को तैयार नहीं तो आदमी कोचाहिये कि वह नौकरी छोड़कर बच्चों की परवरिश करे। उन्हें समय पर दूध, खाना, कपड़ा और सुरक्षा दे। उनकाहोमवर्क करवाये।

कानूनी रूप से आदमी का ऐसा करना सही होगा किंतु क्या सामाजिक और भौतिक स्तर पर यह व्यवहार्य होगा! यह सोचना परिवार के सदस्यों का काम है। कोई दूसरा यह तय नहीं कर सकता कि आदमी या औरत में से कौननौकरी करे और कौन घर पर रहे! हाँ समस्त माता-पिताओं से इतनी मांग करना पूरे समाज का हक है कि बच्चोंको नौकरों के भरोसे छोड़कर उनकी मुस्कान छीनें।


2 comments:

  1. बहुत खूब लिखा है आपने, इन सब का मूल कारण शायद पश्चिम से है ।

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  2. बच्चों की उचित परवरिश पर तो ध्यान देना ही चाहिये.

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