Monday, June 28, 2010

दो पाटों के बीच में कौन पिसना चाहता है। !


अपने पिछले आलेख जिंदगी के बस स्टॉप पर भी समय नहीं रुकता ! में मैंने लिखा था कि टाइम इज मनी के नारे ने भारतीय नारियों को उनकी घरेलू भूमिकायें अधूरी छोड़कर नौकरियों की ओर दौड़ा दिया। इस पर निर्मला कपिलाजी ने मेरे ब्लॉग पर आकर टिप्पणी की है कि वे मेरी इस बात से सहमत नहीं। भारतीय नारियों को उसके शोषण और उन पर हो रहे अत्याचारों और समान अधिकार ने उन्हें इस राह पर चलाया। अगर आदमी जरा सा भी अपने अहंकार से ऊपर उठकर उसे सम्मान देता, यह कभी नहीं होता, कौन नारी चाहती है कि वह दो पाटों के बीच में पिसे। इस अंधी दौड़ के और भी कई कारण हैं न कि टाइम इज मनी।
मैं निर्मलाजी की लगभग सारी बातों से सहमत हूँ। यह सही है कि भारतीय समाज में हर औरत से राजा हरिश्चंद्र की रानी तारामती की तरह व्यवहार करते रहने की अपेक्षा की गई जो हर हाल में पति की आज्ञाकारिणी बनी रहे और तरह-तरह के कष्ट पाकर पति तथा उसके परिवार की सेवा करे किंतु अधिकांश पुरुषों ने स्वयं को भारतीय नारी के सम्मुख राजा हरिश्चंद्र की तरह प्रस्तुत नहीं किया। मैंने उन पुरुषों को देखा है जिन्होंने अपनी कमाई को शराब, जुए अथवा परस्त्रीगमन जैसी बुराइयों में उड़ा दिया। उन्होंने शराब के नशे में अपनी पत्नी को पीटा और घर से निकाल दिया।
जिन घरों में पुरुष ऐसे थे, उन घरों में निश्चित रूप से परिवार के भरण पोषण की जिम्मेदारी औरतों पर आ पड़ी किंतु सवाल यह है कि भारतीय समाज में कितने पुरुष ऐसे हैं जो शराब पीकर अपनी पत्नी को पीटते हैं? कितने पुरुष ऐसे हैं जो अहंकार के कारण पत्नी को सम्मान नहीं देते? कितने पुरुष ऐसे हैं जिन्होंने अपने घरों में स्त्रियों पर अत्यार किये और उन्हें घर में अपने बराबर का सदस्य नहीं समझा? मैं समझता हूँ कि यदि प्रतिशत में बात की जाये तो ऐसे दुराचारी, अत्याचारी, अहंकारी पुरुषों की संख्या एक प्रतिशत से अधिक नहीं होगी। आप दस प्रतिशत मान लीजिये ! दस प्रतिशत पुरुषों की गलती के लिये सौ प्रतिशत पुरुषों पर दोषारोपण करना वस्तुत: देश में फैलाये गये एक भ्रम का परिणाम है। मैं समझता हूँ कि जितने प्रतिशत पुरुष अपने घरों की महिलाओं पर अत्याचार करते हैं तो उतनी ही प्रतिशत औरतें भी हैं जो अपने पतियों पर अत्याचार करती हैं। फिर भी पूरी स्त्री जाति को तो कोई कटघरे में खड़ा नहीं करता ! करना भी नहीं चाहिये। मेरा यह अनुभव है कि जब भी औरतों के सम्बन्ध में कुछ कहा जाता है, एक विशेष मानसिकता से ग्रस्त लोग उसका विरोध करने के लिये आ खड़े होते हैं और मूल विषय से ध्यान भटका देते हैं। समाज न तो स्त्री के बिना चल सकता है और न पुरुष के बिना। हर पुरुष ने माँ के पेट से जन्म लिया है और हर स्त्री किसी पिता की पुत्री है। मेरा पिछला आलेख इस विषय पर नहीं था कि औरतें कमाने के लिये घर से बाहर क्यों निकलीं? मैं तो समाज का ध्यान इस ओर आकर्षित करना चाहता था कि केवल पैसे के लिये जीवन भर हाय-तौबा मचाने से व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र के जीवन में समस्याएं उत्पन्न होती है। सुख-चैन तिरोहित हो जाते हैं। पैसा सबको चाहिये किंतु कितना चाहिये और किस कीमत पर चाहिये, इसके बारे में कभी तो बैठकर विचार करें। फिर भी निर्मला कपिलाजी का आभार है क्योंकि उन्होंने एक बड़े सत्य की ओर सबका ध्यान आकर्षित किया है कि दो पाटों के बीच में कौन पिसना चाहता है।

चींटियों को मछलियाँ बनने में देर नहीं लगती !

जब नदी में बाढ़ आती है तो नदी के किनारों पर रहने वाली चींटियों के झुण्ड बहकर नदी में चले आते हैं जहाँ मछलियाँ उन्हें खा जाती हैं। कुछ समय बाद जब नदी सूख जाती है तो मछलियां मरने लगती हैं और नदी के किनारों पर रहने वाली चींटियाँ उन्हीं मछलियों को खा जाती हैं जिन्हाेंने एक दिन चींटियों को खाया था। यह है काल का प्रताप! पात्र वही हैं किंतु काल के बदलते ही भक्षक भक्ष्य हो जाता है। एक और उदाहरण देखें। जब आदमी जंगल में जाता है तो उसे जानवर घेर लेते हैं किंतु जब जानवर बस्ती में आता है तो उसे आदमी घेर लेते हैं। पात्र वही हैं किंतु देश बदलते ही पात्रों की भूमिका बदल जाती है।

सामान्यत: देश, काल और पात्र मिलकर परिस्थितियों का निर्माण करते हैं किंतु प्राय: देश और काल, पात्रों को अधिक प्रभावित करते हैं। भारत सरकार ने समाचार पत्रों में भारत तथा उसके पड़ौसी देशों में पैट्रोलियम पदार्थों के भाव प्रकाशित करवाये हैं जिनके अनुसार एलपीजी गैस सिलैण्डर का भाव पाकिस्तान में 577 रुपये, बांगलादेश में 537 रुपये, श्रीलंका में 822 रुपये, नेपाल में 782 रुपये तथा भारत में 345 रुपये प्रति सिलैण्डर है और कैरोसिन का भाव पाकिस्तान में 36 रुपये, बांगलादेश में 29 रुपये, श्रीलंका में 21 रुपये, नेपाल में 39 रुपये तथा भारत में 12.32 रुपये प्रति लीटर है।

ये पांचों देश दक्षिण एशिया में स्थित हैं। इन पांचों देशों में लोकतंत्र है। पांचों देश गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी से त्रस्त हैं। पांचों देश अंग्रेजों के पराधीन रहे हैं। पांचों ही देशों में जनता का अपने धर्म पर अटूट विश्वास है। पांचाें ही देशों की जलवायु गर्म है। पांचों देशों में जनसंख्या ठूंस-ठूंस कर भरी हुई है। फिर क्या कारण है कि इन पांचों देशों में पैट्रोलियम पदार्थों के भावों में इतना अंतर है!

सारे तत्व लगभग एक से होने पर भी देशों का अंतर समझे जाने योग्य है। भारत को हमारे ऋषियों ने अकारण ही महान नहीं कहा है। दूसरे देशों से तुलना करने पर भारत की विलक्षणता स्वत: सिध्द होती है। देश को यह महानता, राष्ट्रीय अनुशासन, सांस्कृतिक विलक्षणता और राष्ट्रप्रेम से प्राप्त होती है किंतु जैसे-जैसे प्रजा के जीवन में उच्छृंखलता आती है, लोग संस्कृति को भूलकर अपने देश की अपेक्षा पूंजी से प्रेम करने लगते हैं तो देश की महानता नष्ट हो जाती है। हमारे पड़ौसियों की महानता इसीलिये नष्ट हुई है। वहाँ की प्रजाएँ अपने देश से प्रेम नहीं करतीं और न ही राष्ट्रीय अनुशासन में बंधे रहना चाहती हैं। उनमें अशिक्षा, बेरोजगारी, महंगाई और निर्धनता चरम पर है। वहाँ से जनसंख्या का पलायन भारत की ओर होता रहा है। भारत अपनी प्रजा पर गर्व कर सकता है और कहा जा सकता है कि जब तक भारत की प्रजा राष्ट्र प्रेम और राष्ट्रीय अनुशासन में आबध्द रहेगी, तब तक राष्ट्र हमारे लिये सुखकारी बना रहेगा। अन्यथा चींटियों को मछलियों का स्थान लेने में अधिक समय नहीं लगता।

जिंदगी के बस स्टॉप पर भी समय नहीं रुकता !


टोकियो बसस्टॉप पर लगे एक बोर्ड पर लिखा है- यहाँ केवल बसें रुकती हैं, समय नहीं रुकता। सही बात है, संसार में केवल समय ही ऐसा ज्ञात तत्व है जो सूर्य, धरती और आकाशगांगाओं के चलना आरंभ करने से पहले भी चल रहा था। यदि सूरज अपनी समस्त ऊर्जा खोकर और धरती अपना गुरुत्वाकर्षण खोकर मिट जायें तब भी समय तो चलता ही रहेगा। हम सबने समय के पेट से जन्म लिया है और समय आने पर हम फिर इसी में चले जायेंगे। हम कुछ नहीं हैं केवल समय की शोभा हैं, फिर भी हम लोग समय की कमी का अशोभनीय रोना रोते रहते हैं। वस्तुत: समय किसी के पास कम या अधिक नहीं होता, वह तो हर आदमी को नियति ने जितना दिया है, उतना ही होता है। समय के लिये हमारा रुदन कृत्रिम है और मनुष्य जाति को अकारण दुखी करने वाला है।


संभवत: बिजनिस मैनेजमेंट पढ़ाने वाले लोगों ने सबसे पहले टाइम इज मनी कहकर लोगाें को समय की कमी का रोना रोने के लिये उकसाया। इस नारे ने लोगों का सुख और चैन छीनकर उनके मस्तिष्कों में आपाधापी भर दी। जिसने भी इस नारे को सुना वह अपने समय को धन में बदलने के लिये दौड़ पड़ा। इसी नारे की देन है कि संसार में कहीं भी तसल्ली देखने को नहीं मिलती। रेल्वे स्टेशनों, बैंकों और अस्पतालों की कतारों में खड़े लोग अपने से आगे खड़े लोगों को पीछे धकेल कर पहले अपना काम करवाना चाहते हैं।


टाइम इज मनी के नारे ने भारतीय नारियों को उनकी घरेलू भूमिकाएं अधूरी छोड़कर नौकरियों की ओर दौड़ा दिया। आखिरकार उनके पास भी कुछ तो समय है ही, जिसे धन में बदला जा सकता है। समय को धन में बदलने के लिये आदमियों ने घर के बूढ़े सदस्यों को वृध्दाश्रमों में, बच्चों को क्रैश और डे-बोर्डिंग में तथा परिवार के विक्षिप्त सदस्यों को तीर्थस्थलों और जंगलों में छोड़ दिया क्योंकि इनकी सेवा करेंगे तो समय को धन में कब बदलेंगे ! लोग बिना समय गंवाये करोड़पति बनना चाहते हैं, करोड़पतियों को अपना समय अरबपति बनने में खर्च करना है। इसी आपाधापी को देखकर गुरुदत्ता ने कहा था- ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है !


टाइम इज मनी की विचित्र व्याख्या के विपरीत संसार में कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो अपने समय को इस तरह प्रयोग करते हैं जो समय की सीमा को लांघ जाते हैं। मदनलाल धींगरा ने सन् 1909 में कर्जन वायली की सरेआम हत्या की। जज ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई। इस पर धींगरा ने कहा- आज तुम मुझे फांसी पर चढ़ा दो किंतु आने वाले दिनों में हमारा भी समय आयेगा। अर्थात् वे जानते थे कि समय केवल शरीर के रहने तक साथ रहने वाली चीज नहीं है, वह तो शरीर के मरने के बाद भी रहेगा। भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्ता ने पार्लियामेंट में बम फैंका था। पूरा पार्लियामेंट धुएं से भर गया, वे चाहते तो इस समय का उपयोग भागने में कर सकते थे किंतु उन्हें अपने समय को धन में नहीं बदलना था, देश की आजादी में बदलना था। इसलिये वे वहीं खड़े रहे और फांसी के फंदे तक जा पहुंचे। उन्हें ज्ञात था कि समय फांसी के फंदे के साथ समाप्त नहीं होगा, वह तो आगे भी चलता ही रहेगा। सही बात तो यह है कि समय टोकियो के बसस्टॉप पर तो क्या, जीवन के बसस्टॉप पर भी नहीं रुकता।

Monday, June 21, 2010

जिस बात पर विवेकानंद हँसे, उसी बात पर कबीर रो चुके थे !


आज मेरे मोबाइल पर एक विचित्र एस.एम.एस. आया जिसमें लिखा था– लोग मुझ पर हँसते हैं क्योंकि मैं सबसे अलग हूँ। मैं भी उन पर हँसता हूँ, क्योंकि वे सब एक जैसे हैं। –स्वामी विवेकानंद। इस छोटे से संदेश ने मुझे हिला दिया। स्वामी विवेकानंद भारत की महान विभूति हो गये हैं। उन्होंने कुल 40 साल की आयु पाई। जब 30 वर्ष की आयु में उस युवा सन्यासी ने शिकागो धर्म सम्मेलन में अमरीकियों और यूरोपवासियों को माई ब्रदर्स एण्ड सिस्टर्स कहकर पुकारा तो सम्पूर्ण संसार की आत्मा आनंद से झूम उठी थी। वह पहला दिन था जब संसार ने भारत की आत्मा के मधुर संगीत की झंकार सुनी थी। उससे पहले हिन्दुस्तान का कोई भी आदमी, दंभी अमरीकियों को भाई–बहिन कहकर नहीं पुकार सका था। तब गोरी चमड़ी वाले, काली चमड़ी वालों को अपना दास मानते थे। लेडीज और जेंटलमेन के स्थान पर भाई–बहिन का सम्बोधन उनके लिये नया था। विवेकानंद, जो भारत के गौरव को संसार में हिमालय की तरह ऊँचा स्थान दिलवा गये, उन्हें यदि यह कहना पड़ा कि मैं भी लोगों पर हँसता हूँ क्योंकि वे सब एक जैसे हैं, तो इसके निश्चय ही गंभीर अर्थ हैं। यह बात जानकर हमें रो पड़ना चाहिये कि विवेकानंद हम पर हँसते थे!


क्या भारत के लोग सचमुच ऐसे हैं जिन पर हँसा जाये। हँसे तो अंग्रेज भी थे 1947 में यह सोचकर कि देखो इन हतभागी हिन्दुस्तानियों को, जो हम जैसे योग्य शासकों को इस देश से भगा रहे हैं। हमने इन्हें कायर और षड़यंत्री राजाओं, नवाबों और बेगमों के चंगुल से आजाद करवाकर नवीन शासन व्यवस्थाएं दीं। हमने इन्हें रेलगाड़ी, सड़क, पुल, टेलिफोन, बिजली, सिनेमा, अस्पताल, बैंक और स्कूल दिये और ये हमें भगा रहे हैं ! अंग्रेजों को पूरा विश्वास था कि एक दिन हिन्दुस्तानी अपने इस अपराध के लिये पछतायेंगे और हमें हाथ जोड़कर वापस बुलायेंगे। एक–एक करके 62 साल बीत चुके। हमें आज तक अंग्रेजों की याद नहीं आई। भारत की रेलगाडि़याँ, सड़कें, पुल, टेलिफोन, बिजली, सिनेमा, अस्पताल, बैंक और स्कूल दिन दूनी, रात चौगुनी गति से बढ़कर आज देश के कौने–कौने में छा चुके हैं। देश आगे बढ़ा है। सम्पन्नता आई है, हमारी आंखों के सामने, मध्यमवर्ग बैलगाडि़यों से उतरकर कारों में आ बैठा है। आलीशान मॉल, फाइव स्टार होटलों और हवाई जहाजों में पैर धरने की जगह नहीं बची है। तो क्या फिर भी हम इसी लायक बने हुए हैं कि हम पर हंसा जाये!


जवाहरलाल नेहरू, जिन्होंने अपने हाथों से हिन्दुस्तान को हिन्दुस्तान बनाया, वे भी एक दिन हम पर यह कहकर हंसे थे– लोग कारों में चलते हैं किंतु उनमें बैलगाडि़यों में चलने की तमीज नहीं है। कबीर भी हम पर यह कहकर हँसते रहे थे– पानी में मीन पियासी, मोहे सुन–सुन आवत हाँसी ! किंतु कबीर को यह कहकर रोना भी पड़ा था– सुखिया सब संसार है, खावै और सोवे, दुखिया दास कबीर है, जागै और रौवे। वस्तुत: देखा जाये तो विवेकानंद, जवाहरलाल नेहरू और कबीरदास एक ही बात पर हँस और रो रहे हैं और वह बात यह है कि हम केवल अपने सुख और स्वार्थों की पूर्ति तक ही सीमित होकर रह गये हैं। हमें कोई अंतर नहीं पड़ता इस बात से कि हमारे किसी कृत्य से समाज के दूसरे लोगों को कितनी चोट पहुंच रही है! ऋषियों की संतान होने का दावा करने वाले भारतीय, भौतिक उपलब्धियों के पीछे पागल होकर, एक दूसरे के पीछे लट्ठ लेकर भाग रहे हैं। इसी कारण हम विवेकानंद को एक जैसे दिखाई देते थे और इसी कारण कबीर हमें देखकर रातों को जागते और रोते थे।

Tuesday, June 8, 2010

क्या अन्तर है वारेन हेस्टिंग्ज और वारेन एण्डरसन की कहानी में !

भारत के लोग वारेन हेस्टिंग्स और वारेन एण्डरसन, दोनों नामों से भली भांति (अथवा बुरी भांति!) परिचित हैं। वारेन हेस्टिंग्स भारत का पहला गवर्नर जनरल (ई.1772 से 1785) बना। ईस्ट इण्डिया कम्पनी को भारत सरकार में बदलने का पूरा श्रेय (अथवा कलंक!) वारेन हेस्टिंग्स को जाता है। उसने ईस्ट इण्डिया कम्पनी को दो चेहरे दिये। पहला चेहरा पिट्स इण्डिया एक्ट के रूप में था जिसमें कहा गया था कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी भारत के किसी भी देशी राज्य को बलपूर्वक अपने क्षेत्र में नहीं मिलायेगी। इस चेहरे के नीचे दूसरा चेहरा छिपा था जो भारतीय क्षेत्राें पर छल–कपट से नियंत्रण करने और देशी राजाओं, नवाबों और बेगमों को पैरों तले रौंदकर अपने अधीन बनाने का काम करता था।

वारेन हेस्टिंग्स की पूरी कहानी टिपीकल है। वह गरीब बाप का बेटा था। बचपन आवारागर्दी में गुजारा और बड़ा होकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी में बाबू बन गया। कम्पनी में घूसखोरी, भ्रष्टाचार, अनुशासनहीनता, दलाली तथा निजी व्यापार का बोलबाला था। अंग्रेज अधिकारी भारत से अथाह धन लूट कर इंगलैण्ड लौटते थे। पूरे यूरोप में निर्धन थॉमस पिट (ई. 1643–1726) का उदाहरण दिया जाता था जिसने भारत से इतना धन बटोरा था कि वह इंग्लैण्ड के उल्लेखनीय अरबपतियों में गिना जाने लगा था। ईस्ट इण्डिया कम्पनी में बकायदा दलाल नियुक्त होते थे जो भारतीय राजाओं और नवाबों से सम्पर्क रखते थे और उन्हें महंगे उपहार, विदेशी शराब तथा गोरी वेश्याएं उपलब्ध करवाकर कम्पनी के व्यापारिक हित साधते थे। मौका मिलते ही अंग्रेज अधिकारी दोनों हाथों से पैसा बटोरते थे। वे खुल्लमखुल्ला रिश्वत, कमीशन, भेंट, उपहार, ग्रेटीट्यूड तथा टिप लेते और देते थे। वारेन हेसि्ंटग्स भी धन की इस लूट में शामिल हो गया और तरक्की करता हुआ कम्पनी का गवर्नर जनरल बन गया। उसका खजाना हीरों के हार और अंगूठियों, सोने चांदी के बरतनों तथा शेर–चीतों की खालों से भर गया। जब वह अपने देश वापस लौटा तो उस पर भ्रष्टाचार का मुकदमा चला। हेस्टिंग्स ने स्वयं को गोली मारी किंतु बच गया। मुकदमे में भी वह बरी कर दिया गया।

वारेन हेस्टिंग्ज की कहानी यहां पूरी हो जाती है किंतु वारेन एण्डरसन की कहानी उसके पूरे दो सौ साल बाद आरंभ होती है। वारेन हेस्टिंग्स अंग्रेज था जबकि वारेन एण्डरसन अमरीकी है, किंतु है उसी यूरोपीयन प्रजाति का वंशज। वारेन हेस्टिंग्स की ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारत पर गुलामी लादी और भारत का रक्त चूसा जबकि वारेन एण्डरसन की यूनियन कार्बाइड कम्पनी ने विषैली गैस लीक करके 15 हजार लोगों को मौत की नींद सुलाया तथा 5 लाख लोगों को अपाहिज बना दिया। वारेन हेस्टिंग्स ने भारत से लूटे गये धन का हिसाब बताने से मना कर दिया और वारेन एण्डरसन ने यूनियन कार्बाइड से निकली जहरीली गैस का नाम बताने से मना किया। वारेन हेस्टिंग्स को भारत से लौटने के बाद अपने ही देशवासियों के मुकदमे का सामना करना पड़ा जबकि वारेन एण्डरसन अपने निजी चार्टर्ड प्लेन में बैठकर 25 साल से पूरी दुनिया में ऐश करता घूम रहा है। यही अंतर है वारेन हेस्टिंग्स और वारेन एण्डरसन की कहानी में।

पन्द्रह हजार आत्माएँ उसे ढूंढ रही हैं !


पिछले पच्चीस साल से वह अपनी कम्पनी के ट्रेेड सीक्रेट के साथ अपने निजी चार्टर्ड प्लेन में बैठकर उड़ रहा है। पन्द्रह हजार मृतकों की आत्माएं उसका पीछा कर रही हैं। भारत की खुफिया एजेंसियां उसे दुनिया के कोनों–कोचरों में ढूंढ रही हैं। 5 लाख लोगों की तीन पीढि़यां उसे खोजते–खोजते थक गई हैं किंतु वह किसी के हाथ नहीं आ रहा। संसार का ऐसा कोई अखबार नहीं है जिसमें उसकी गुमशुदगी का इश्तहार छपवाया जा सके। जिस समय वह अपने निजी प्लेन में बैठकर दुनिया की आँखों से ओझल हुआ था, उस समय उसकी आयु 65 साल थी। अब वह 90 वर्ष का हो चुका है। उसका नाम एण्डरसन है।

यह वही एण्डरसन है जिसकीयूनियन कार्बाइड से निकली गैस ने 2–3 दिसम्बर 1984 की स्याह–सर्द रात में मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में 15 हजार लोगों को मौत की नींद सुलाया। डॉक्टरों ने उससे पूछा, हमें बताईये कि आपके प्लाण्ट से किन गैसों का रिसाव हुआ ताकि हम पाँच लाख घायलों का सही उपचार कर सकें और उनका जीवन बचा सके। उसने बेशर्मी से जवाब दिया, यह हमारी कम्पनी का ट्रेड सीक्रेट है! उसके बाद वह अपनी जमानत करवाकर अपने चार्टर्ड प्लेन में बैठकर अमरीका के किसी सुविधा सम्पन्न शहर को उड़ गया। तभी से हम कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे की तर्ज पर आँखें मल–मल कर अमरीका की ओर देख रहे हैं कि एक न एक दिन अमरीका उस 90 साल के एण्डरसन को पकड़कर भारत को सौंप देगा।

आपने टेलिविजन पर एक विज्ञापन देखा होगा, एक आदमी हवाई जहाज से उतर कर संदेश देता है– ह्यूमन राइट्स हैव नो बाउण्ड्रीज। जिस अमारीका को ह्यूमन राइट्स की चिंता हर समय सताती रहती है, उस अमरीका को भोपाल त्रासदी में मरे 15 हजार लोगों और 5 लाख घायलों के राइट्स का ध्यान क्यों नहीं आता! एण्डरसन अपने जिन भारतीय साथियों को भारत में छोड़ गया, उन्हें अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा सुखपूर्वक गुजार देने के बाद सीजेएम कोर्ट से 2–2 साल की कैद मिली है। इस फैसले ने देश में एक नई चर्चा को जन्म दिया है। लोगों को लगता है कि इन दोषियों के जीवन का शेष हिस्सा बड़ी अदालतों में इस निर्णय के विरुद्ध अपील खड़ी करके बीत जायेगा। उन पर एक–एक लाख रुपये का जुर्माना किया गया है। लोगों को यह भी लगता है कि इतने रुपये तो यूनियन कार्बाइड के अधिकारी साल भर में टॉयलेट में काम आने वाले टिश्यू पेपर पर खर्च कर देते हैं। यूनियन कार्बाइड के लिये पांच लाख रुपये का जुर्माना भी लोगों को कम लगता है! जो लोग हाल ही में मंगलौर हवाई दुर्घटना में मरे थे, उनके परिजनों को 57–57 लाख का मुआवजा मिला।

एक दुखद किंतु विचित्र चर्चा यह भी है कि क्या भोपाल त्रासदी वाले लोग पुरानी रेट्स पर मरे थे और मंगलौर दुर्घटना के लोग नई रेट्स पर मरे हैं! जब दुनिया में प्रजातंत्र की आंधी आई थी तब यह कहावत चल निकली थी, प्रजातंत्र में सब बराबर हैं किंतु कुछ लोग ज्यादा बराबर हैं। आज की दुनिया में यह कहावत चल पड़ी है, सब इंसानों के ह्यूमन राइट्स बराबर हैं किंतु अपराधियों के ह्यूमन राइट्स अधिक बराबर हैं।