Monday, July 19, 2010

एक प्रियंका चौपड़ा हैं और एक ये हैं !


रविवार के दिन जोधपुर में दर्दनाक दुर्घटना हुई। एक दादी अपनी पोती को लेकर चलती हुई रेल से नीचे गिर पड़ी। दादी तो सही–सलामत बच गई किंतु बच्ची का हाथ कट गया। दादी इसलिये गिरी क्योंकि उस डिब्बे में इतनी भीड़ थी कि दादी दरवाजे से आगे नहीं बढ़ सकी। दादी आगे इसलिये नहीं बढ़ सकी क्योंकि डिब्बे में क्षमता से अधिक लोग भरे हुए थे। डिब्बे में क्षमता से अधिक लोग इसलिये भरे हुए थे क्योंकि भारत की जनसंख्या आज पूरी गति से बढ़ रही है। उसे चीन से आगे निकलने की जल्दी जो पड़ी है! आज अनेक विकसित देशों में जनसंख्या स्थिरिकरण का लक्ष्य प्राप्त कर लिया गया है, वहां जनसंख्या नहीं बढ़ती। इसलिये वहां इस तरह की समस्याएं उत्पन्न नहीं होतीं। न तो हर वर्ष सड़कों की लम्बाई बढ़ाने की आवश्यकता है, न ट्रेनों की संख्या। न हर वर्ष नये स्कूल खुलते हैं, न चिकित्सालय। जो संसाधन एक बार विकसित कर लिये जाते हैं, समय बीतने के साथ–साथ उनके संरक्षण और जीर्णोद्धार का काम किया जाता है। जबकि भारत में चाहे जितनी भी नई सड़कें, रेलगाडि़यां, स्कूल, चिकित्सालय, पुल, बिजलीघर, सीमेण्ट के कारखाने बना दो, अगले साल वे कम पड़ जायेंगे। भारत की जनसंख्या में हर साल एक आस्ट्रेलिया के बराबर जनसंख्या जुड़ जाती है।ढाई साल की बालिका का कटा हुआ हाथ लम्बे समय तक हमें स्मरण करवाता रहेगा कि हमने अपने देश को किस तरह ठसाठस जनसंख्या वाला देश बना दिया है कि बच्चों को भी ट्रेन में बैठने का स्थान नहीं बचा है। मैं समझता हूँ कि पूरे राष्ट्र को उन बच्चों से क्षमा मांगनी चाहिये जो अपने बड़ों की गलतियों का दण्ड भुगत रहे हैं। इस पूरे प्रकरण में यह तथ्य भी दुखदायी है कि जो दादी ट्रेन से गिरी उसकी उम्र केवल 38 साल है और जिस पोती का हाथ कटा उसकी आयु ढाई साल है। अर्थात् दादी और पोती की आयु में केवल 35–36 साल का अंतर है। क्या यह उम्र दादी बनने के लिये सही है? यदि 35 साल की उम्र में औरत दादी बनेगी तो फिर रेल के डिब्बे में बैठने के लिये जगह कैसे बचेगी? है किसी के पास इस प्रश्न का उत्तर?अभी कुछ ही दिन पहले, संभवत: इसी सप्ताह सिने अभिनेत्री प्रियंका चौपड़ा ने अपनी आइसवीं सालगिरह मनाई है। एक ओर प्रियंका चौपड़ा जैसी औरतें इस देश में रहती हैं जिन्होंने 28 साल की आयु में भी विवाह नहीं किया और दूसरी ओर रेल से नीचे गिरने वाली दादी है जो 35–36 साल की उम्र में दादी बन जाती है। संभवत: इसी को कहते हैं– दुनिया के समानान्तर एक और दुनिया! आज महिलाएं पुरुषों के कदम से कदम बढ़ाकर हर क्षेत्र में अपनी योग्यता सिद्ध कर रही हैं, फिर ऐसा क्यों है कि आज भी करोड़ों महिलाएं सोलहवीं सदी की परम्पराओं से बंधी हुई हैं और गुे–गुडि़यों से खेलने की आयु में पति, ससुराल और बच्चों की जिम्मेदारी ओढ़ लेती हैं? चीन हमसे बहुत बड़ा है, आकार में भी, जनसंख्या में भी किंतु उसने विगत कुछ दशकों से अपने नागरिकों के लिये एक बच्चे का नियम लागू कर रखा है। इसी के चलते चीन अपनी जनसंख्या को स्थिर करने का लक्ष्य शीघ्र ही प्राप्त कर लेगा किंतु मुझे भय है कि हमारे देश की रेलों के थर्ड क्लास के डिब्बे इतने ठसाठस भर जायेंगेे जिनसे गिरकर हाथ–पैर गंवाने वालों की संख्या बढ़ती ही चली जायेगी। यह दूसरी बात है कि डिब्बों के बाहर थर्ड क्लास की जगह सैकेण्ड क्लास लिखा होगा!

2 comments:

  1. पोस्ट बहुत अच्छी और विचारणीय है.... लेकिन यह सोच रहा हूँ कि कैसे कोई महिला पैंतीस साल की उम्र में दादी बन सकती है....? लड़कों का तो सोलह साल की उम्र में स्पर्म फौर्मैशन भी नहीं होता...

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  2. इसी से तो एवरेज मेन्टेन होगा...प्रियंका का आभार!! :)

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