Sunday, February 14, 2010

महंगी शादी का अर्थ है प्राकृतिक संसाधनों की बरबादी !

मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत ने आम आदमी के मन की पीड़ा को शब्द दिये। आम भारतीय जिस बात को चीख–चीख कर कहना चाहता है, उसे पारदर्शी शब्दों में व्यक्त करने करने की कला श्री गहलोत को आती है। उन्होंने शादियों में हो रहे पैसे के वीभत्स प्रदर्शन पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि लोग एक–एक कार्ड पर 500 से लेकर 2000 रुपये तक खर्च करते हैं और जब वे शानो–शौकत का प्रदर्शन करते हुए महंगी गाडि़यों में बैठकर कार्ड बांटने आते हैं तो मूड खराब हो जाता है। एक–एक शादी में दस–दस हजार लोगों को खाना खिलाया जाता है और एक–एक प्लेट के लिये एक–एक हजार रुपये तक भुगतान किया जाता है। ऐसा करने वाले लोग बेशर्म हैं और ऐसी शादियों में जाकर मुझे शर्म का अनुभव होता है।

भारतीय विवाह वस्तुत: अब पारिवारिक आयोजन न रहकर सामाजिक एवं आर्थिक हैसियत और पारिवारिक शक्ति प्रदर्शन का भौण्डा हथियार बन गये हैं। यही कारण है कि वे सार्वजनिक मेलों की तरह आयोजित होते हैं जिनके कारण सड़कों पर जाम लग जाता है। विवाह स्थल पर लोग एक दूसरे को धक्का देकर खाना खाते हैं। समारोह स्थल पर थर्मोकोल और प्लास्टिक के गिलासों के पहाड़ बन जाते हैं। हर आदमी थाली में बड़ी मात्रा में झूठन छोड़ता है। कीमती पानी की बरबादी होती है। लोग कॉफी और आइसक्रीम का एक साथ सेवन करते हैं। लाखों रुपये की बिजली साज–सज्जा पर फूंकी जाती है। बड़े–बड़े जनरेटरों में तेल जलाया जाता है और हजारों रुपये के पटाखों में आग लगाई जाती है जिनसे वायु एवं ध्वनि प्रदूषण होता है। अधिकतर शादियों में नौजवान लड़के शराब पीकर डी जे के तेज शोर में अश्लील भावों वाले गीतों पर अपनी बहिनों, भाभियों, चाचियों और ताइयों के साथ नृत्य करते हैं जिन्हें देख–सुन कर शर्म आती है।

शादियों में सम्मिलित होने के लिये आदमी हजारों रुपये के महंगेे सूट बनवाते हैं। औरतें और लड़कियां महंगी पोषाकें और गहने बनवाती हैं। लाख–लाख रुपये के तो अचकन और लहंगे सिलते हैं। लोग लाखों लीटर पैट्रोल केवल शादियों में दावत खाने के लिये फूंक देते हैं। मैं पिछले पच्चीस वर्ष से इस तरह की शादियों के खिलाफ आवाज उठाता रहा हूँ।

जो व्यक्ति मेरे पास विवाह का निमंत्रण लेकर आता है, मैं उससे आग्रह करता हूँ कि शादी में कम से कम लोगों को बुलायें और कम से कम पैसे खर्च करें। लोग मेरी बात से असहमति जताते हुए कहते हैं कि आप कह तो सही रहे हैं किंतु पैसा खर्च किये बिना विवाह का मजा नहीं आता। घर के सदस्यों का भी मन रखना पड़ता है। यदि खर्चा नहीं करें तो लोग कहेंगे कि पूरा मंगतापना दिखा दिया। तब उन लोगों को मैं अपने विवाह के बारे में बताता हूँ। मेरा विवाह 25 साल पहले हुआ था। उस समय मैं बैंक में मैनेजर था। मैंने अपने पिता से अनुरोध किया कि मेरा विवाह दिन में करें। लाइटिंग, सजावट, कपड़े, कैमरा, घोड़ा, बारात आदि पर खर्चा न करें। मेरे पिता और श्वसुर दोनों ने मेरे प्रस्ताव का स्वागत किया। मुझे, मेरे पिता या मेर श्वसुर को किसी ने नहीं कहा कि आपने कंजूसी की अथवा मंगतापना दिखाया! मेरे चारों छोटे भाई–बहिनों के विवाह में भी पूरी सादगी रखी गई। मेरे पिता ने कभी किसी से दहेज नहीं मांगा। न मेरे पिता से किसी ने दहेज मांगा। मैं अपना और अपने घर का उदाहरण इसलिये देता हूँ ताकि कोई यह न समझे कि कोरे उपदेश देना बड़ा आसान होता है। वास्तव में तो सादा जीवन शैली को अपनाना बहुत आसान होता है। जटिलता तो जीवन में पैसे को शामिल करने से बढ़ती है। अब भी समय है, हम मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के शब्दों का मर्म समझें। शादियों में पैसे का भौण्डा प्रदर्शन करके प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट न करें।

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