Sunday, March 21, 2010

जिम्मेदारियां निभाने वाली आवारा हैं वे !


वह लावारिस नहीं है किंतु सारे दिन आवाराओं की तरह रहती है। वह शहर की किसी भी भीड़ भरी सड़क अथवा चौराहे पर खड़ी हुई दिखाई दे जाती है, कभी अकेली तो कभी झुण्ड में। सर्दी, गर्मी और बरसात में भले ही ट्रैफिक का सिपाही थोड़ा हट कर खड़ा हो जाये किंतु वह मानव सभ्यता की प्रहरी की तरह कड़कड़ाती ठण्ड, चिलचिलाती धूप और घनघोर बरसात में भी अपने स्थान से इंच भर नहीं हिलती। जब से उसने मानवों को अपना पुत्र माना, तब से वह अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करती आ रही है। आदमी ने उसके दूध को अमृत मानकर पिया और उसके पुत्रों को खेतों और बैलगाड़ियों में जोता। एक समय था जब स्वयं ईश्वर उसका प्यार पाने के लिये मानव बनकर आया और गोपाल कहलाया किंतु जैसे ही मानव ने गांव छोड़कर शहरों में रहना आरंभ किया, हल के बदले ट्रैक्टर अपनाया और बैलगाड़ी के बदले कार चलाने लगा, तब से मानव ने अपनी इस निरीह माता के सुख-दुख से नाता ही तोड़ लिया। अब तो बस वह दूध देने की मशीन भर बनकर रह गई हैं।
आप सही समझे हैं, मैं शहरों में रहने वाली गौओं की ही बात कर रहा हूँ। शहर की हवा ही ऐसी है। जिस तरह शहरों में रहने वाले अधिकांश लोग अपनी माताओं के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं करते, वे गौमाता के प्रति भी वैसे ही रूखे और निर्दयी बन गये हैं। यही कारण है कि शहरों में रहने वाली गायों के कंधों पर गांवों, ढाणियों और खेतों में रहने वाली गायों की अपेक्षा तीन गुनी जिम्मेदारियों का भार है। उन्हें सुबह-सायं दूध तो देना ही है, बछड़े-बछड़ियां भी पैदा करने ही हैं किंतु साथ ही अपने भोजन का प्रबंध भी उन्हें स्वयं अपने बल बूते पर करना है। नगर के पगलाये हुए ट्रैफिक के बीच खड़े रहकर अपने जीवन की रक्षा भी स्वयं ही करनी है।
शहर के हर चौराहे पर भुतहा चेहरे लिये हुए खड़ी हुई इन हजारों गायों को देखकर कौन कह सकता है कि एक दिन भारतीय इस गाय को अपनी माता कहते नहीं अघाते थे! आज भी वे भूले बिसरे गीतों की तरह बच्छ बारस पर उनके बछड़ों की पूजा करते हैं किंतु आज के दौर में मानव सभ्यता की यह माता होटलों से फैंकी गई झूठन पाने के लिये आवार कुत्ताों से प्रतिस्पर्धा कर रही है। वह प्लास्टिक की थैलियों को खाने के लिये कचना बीनने वाले बच्चों से सींग लड़ा रही है। वह शहर के भयंकर गति से भाग रहे ट्रैफिक के बीच सहमी हुई सी खड़ी होकर आदमी से अपने प्राणों की भीख मांग रही है।
कोई है जिसे इन गायों को देखकर पीड़ा होती है? कोई है जो इन गायों के मालिकों को समझा सके कि भाई तुम इन गायों को शहरों से दूर ले जाओ, सुबह शाम इनका दूध दूकर इन्हें आवारा की भांति भटकने के लिये सड़कों पर मत छोड़ो? कोई है जो इन गायों को सड़कों से दूर किसी सुरक्षित स्थान पर भेजकर शहर की सड़कों पर फैले मौत के भय से अपने बच्चों को मुक्त कर सके?

3 comments:

  1. जागरूक करने वाला लेख ......गाय माता का ये हाल देखा नहीं जाता .....

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  2. हिन्दी में विशिष्ट लेखन का आपका योगदान सराहनीय है. आपको साधुवाद!!

    लेखन के साथ साथ प्रतिभा प्रोत्साहन हेतु टिप्पणी करना आपका कर्तव्य है एवं भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें. यह एक निवेदन मात्र है.

    अनेक शुभकामनाएँ.

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  3. आदरणीय उड़न तश्तरीजी,
    नमस्कार। आपने सर्वथा उचित कहा है, मेरा प्रयास होना चाहिये कि प्रतिदिन कम से कम एक अच्छे आलेख पर टिप्पणी करूँ किंतु कार्याधिकता, साधनों की अनुपलब्धता एवं आदत के अभाव के चलते मैं ऐसा करने में असफल रहा हूँ। भविष्य में जितना हो सकेगा, प्रयास करूंगा। प्रशंसा करने एवं शुभकामनायें देने के लिये आभारी हूँ।
    आदरणीय देवेश प्रतापजी का भी धन्यवाद
    – डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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