Wednesday, March 24, 2010

हमारी समस्त माताएं संकट में हैं !

जन्मदात्री माता की तरह धरती, गौ, गंगा, गीता, गायत्री और पराई स्त्री को भी हम माता मानते हैं। यह विशाल धरती प्राणी मात्र की माता है जो हमारे मल–मूत्र और गंदगी को सहन करके, जल और अन्न से हमारा शरीर बनाती है और उसे जीवित रखती है। गौ हमें अपने दूध से पुष्ट करती है। उसके बछड़े हमारे जीवन का अधिकांश बोझ अपने कंधों पर रख लेते हैं। गंगा हमारे तन और मन को शुद्ध करती है, हमारे पाप धोती है और हमारे पूर्वजों को गति प्रदान करती है। गीता हमें जीवन में कर्मयज्ञ की ओर अग्रसर करती है। गायत्री, मंत्रों के रूप में प्रकट होकर हमें सुखी बनाती है। इन सबके साथ–साथ हमने पराई स्त्री को भी माता का सम्मान दे रखा है ताकि हमारी अपनी माता को हर स्थान पर सम्मान मिले।

इन दिनों एक बात बार–बार अनुभव में आती है कि ये समस्त माताएं संकट में हैं। जितनी तरह की माताएं हैं उतनी ही तरह के संकट हैं। जिस तरह देश में बड़े–बड़े सैक्स रैकेट्स पकड़े गये हैं, उन्हें देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि भारतीय माताएं कितने बड़े खतरे में हैं। बहुत सी माताओं को नारी मुक्ति के नाम पर यह कहकर भड़काया जा रहा है कि वे पुरुष को अपना पुत्र, पिता, भाई या पति न समझकर अपना प्रतिद्वंद्वी समझें। उनकी इस प्रवृत्ति के चलते भारतीय माताएं सशक्त होने के स्थान पर और अधिक कमजोर हो रही हैं।

धरती माता पर कई ओर से संकट गहरा रहा है। वायुमण्डल का तापक्रम बढ़ रहा है। ओजोन परत में छेद हो गये हैं। ग्रीन हाउस प्रभाव वाली गैसों के कारण धरती जलता हुआ अंगारा बनती जा रही है। गंगा माता पर आये संकट से कौन अपरिचित है! वह तेजी से लुप्त हो रही है। उसे जल देने वाले ग्लेशियर सूख रहे हैं और उसकी क्षीण होती जा रही धाराओं पर विद्युत एवं सिंचाई परियोजनाएं खड़ी की जा रही हैं। गाय की हालत तो गंगाजी से भी बुरी है। वह शहरों में ही नहीं गांवों में भी दुख पा रही है। भारतीय गौ को अनार्थिक मानकर, उसकी अच्छी से अच्छी नस्लों को समाप्त किया जा रहा है और वर्णसंकर नस्लें पनपाई जा रही हैं।

अब गीता को शायद ही कोई माता मानता है। वह पूजाघरों में लाल कपड़े से ढककर रखी गई श्रद्धेय पुस्तक मात्र बनकर रह गई है। उसे कोई नहीं पढ़ता, कोई जीवन में नहीं उतारता। लोगों के मन में धन एकत्रित करने की जो लालसा विस्तृत हुई है उसे देखकर लगता है कि लोग यह भूल गये हैं कि जीव को तो बार–बार धरती पर आते ही रहना है। केवल यही जन्म तो हमें नहीं जीना? तब सारा प्रपंच केवल इसी जीवन को सुखी बनाने के लिये क्यों? क्या हो जायेगा यदि इस जन्म में हमने लाखों करोड़ों रुपये जोड़ लिये तो! यह सब तो इस जीवन के समाप्त होने के साथ ही फिर से पराया हो जायेगा। अगला जन्म जाने किस घर में हो! वहां फिर से नया धन कमाना पड़ेगा। यह चक्र तब तक चलता रहेगा जब तक हम अपने आप को सब तरह की वासनाओं से मुक्त करके परमधाम को प्राप्त नहीं कर लेंगे। गायत्री का अर्थ है जीवन में जो कुछ भी ओजस्वी है, उस सबको नमस्कार किंतु भारतीय समाज अपना तेज खोता जा रहा है। भय, लालच हिंसा और नंगेपन का अंधकार चारों ओर से बढ़ा चला आ रहा है किंतु इतना होने पर भी इन संकटों से बचने के मार्ग बंद नहीं हुए हैं। अभी हमारे पास कुछ समय है कि हम अपनी माताओं को संकटों से उबारकर अपनी संस्कृति की रक्षा करें।

आप सोचेंगे, एक माता तो रह ही गई किंतु भारत माता के कष्टों की बात फिर कभी।

4 comments:

  1. हमारी भारतीया संस्कृति यही है ...जिससे कुछ मिला उसे मान मान लिया मन ही नहीं वरन निभाया भी .. पर आजकल तो माँ शब्द पर ही बवाल मचा देते है नहीं मानते तो वन्देमातरम पर छिड़ी जंग इसका सबूत नहीं तो और क्या है

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  2. सोनलजी,
    टिप्पणी और सहमति हेतु आभार किंतु मेरी दृष्टि में यह बात ही गलत है कि जो जिससे मिला सीखा हमने, गैरों को भी अपनाया हमने। हमें किसी भी अभारतीय सभ्यता से ऐसा क्या मिल सकता था जिसे अपनाने की हमें आवश्यकता पड़ गई थी। वेद समस्त सत्य ज्ञान की पुस्तकें हैं। उपनिषदों का गहरा दर्शन उपलब्ध है हमारे पास। उपनिषदों को निचोड़कर भगवान कृष्ण ने गीता और तुलसीदासजी ने रामचरित मानस हमारे सामने धर दी। फिर भी यदि हम यह गायें कि जो जिससे मिला सीखा हमने... हास्यास्पद बात है। अपने आप को नीचा दिखाने की बात है। रही बात गैरों को भी अपनाया हमने की सो बात यह है कि हमारे लिये गैर कोई नहीं था, वसुधैव कुटुम्बकम् का उद्घोष हमने ही किया था। ये तो वे बुरे लोग ही थे जो गैर बनकर हमारे सामने आये और हमें युद्धों के मैदानों में परास्त करके बोले कि गैरों को भी अपनाना सीखो और हम गाने लगे– गैरों को भी अपनाया हमने। क्यों तो कोई गैर बनता है और क्यों फिर अपनाये जाने के के लिये हमसे जबर्दस्ती करता है। मेरी बात को इस उदाहरण से समझना सरल होगा कि 1947 में कुछ लोगों ने बलपूर्वक लड़–झगड़ और जीत कर, हमारा खून बहाकर हमसे अलग होकर पाकिस्तान बनाया। अब पाकिस्तानी और बांगलादेशी घुसपैठिये इस देश में आकर रहना चाहते हैं। इसलिये मेरा विचार यही रहा है कि ऐसे मत बनिये जो हर किसी से सीखना पड़े, ऐसे मत बनिये जो हर किसी को अपनाना पड़े। ऐसे बनिये जो लोग हमसे गैर बनने की बात ही न सोचें। प्रेम उतना ही और उस तरीके से ही बरसाइये कि लोग उस प्रेम की कीमत समझें और और उस प्रेम को हमारी कमजोरी न समझें। बात कुछ लम्बी हो गई इसके लिये क्षमा चाहता हूँ। मुझे प्रसन्नता है कि आपने इस पीड़ा को इतनी गहराई से अनुभव किया है कि कुछ लोग अब माँ शब्द पर ही बवाल मचा देते हैं। पुन: धन्यवाद। – डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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  3. मोहनजी ,
    आपका रोष जायज़ है ,पीड़ा तो उठती है ,पर मेरा विश्वास सहिष्णुता पर हमेशा से रहा है जो जितना लचीला होता है वह उतने ही तूफ़ान झेल जाता है और अंत में अपनी अनूठी पहचान के साथ खडा रहता है,इसी लोच के साथ आज हम अपनी सहस्त्र वर्षो पुरानी अस्मिता के साथ जीवित है, मेरे लिए भारतीय संस्कृति सदैव अजर अमर रहेगी, रही बात राजनैतिक स्वार्थ सिद्ध करने वालों की तो उनको हमने खुद चुना है चुनना हमारे हाँथ था ,पर वहां जाकर वो अगर वो अपनी स्वार्थसिद्धि में लग जाते है तो हम ५ साल के लिए मजबूर हो जाते है उनके उचित अनुचित झेलने के लिए.
    दोष उनका नहीं जो यहाँ आकर बस रहे है जिम्मेदार वो है जो बसा रहे है अब बन्दर के हाँथ में तलवार दे दी है तो झेलिये भी ................
    रावण को राम ने नहीं मारा ...विभीषण ने मारा

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  4. सोनलजी,
    आपका जवाब मुझे अच्छा लगा। धन्यवाद किंतु एक बार फिर क्षमा चाहता हूँ। सहिष्णुता के गुण एवं इसकी शक्ति से मुझे इन्कार नहीं किंतु सहिष्णुता का परिणाम क्या हुआ? एक समय था जब हिन्दुकुश पर्वत से लेकर बर्मा, जावा, सुमात्रा, बाली, बोर्नियो, स्याम आदि द्वीप भारत राष्ट्र के अंतर्गत गिने जाते थे किंतु आज उस भारत में से कितने देश अलग हो चुके। अफगानिस्तान गया, पाकिस्तान गया, बांगलादेश गया, नेपाल गया, भूटान गया, बर्मा गया। जावा, सुमात्रा, बाली, बोर्नियो, स्याम आदि द्वीप गये। इन देशों में अब वेद और गीता पढ़ने वालों के लिये कोई जगह नहीं। आप वहां शिवजी को जल नहीं चढ़ा सकते। कहीं धार्मिक उन्माद तो कहीं आतंकवाद। कहीं माओवाद तो कहीं नक्सलवाद। फिर भी हम सहिष्णु होकर गीत गायें कि रोम, मिश्र और यूनान मिट गये जहां से, कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी! हद हो गई और कितनी हस्ती मिटायेंगे? कहां तक जायेंगे? हमारे लिये कोई जगह छोड़ेंगे कि नहीं? उदारता और सहिष्णुता सगी बहिनें हैं और हर भारतवासी के हृदय में निवास करती हैं किंतु दुनिया वाले कितने कठोर हैं यदि हमने शठ शाठ्यम समाचरेत की नीति नहीं अपनाई तो दुनिया वाले हमें खा जायेंगे। भेडि़यों के समक्ष हिरणों की सहिष्णुता भेडि़यों को लाभ ही पहुंचाती है और रहे हिरण, उनकी भी हस्ती संसार से कभी समाप्त नहीं होती। हम किसी को जीतना नहीं चाहते, किसी को सताना नहीं चाहते किंतु कोई हमें न सताये, इसके बारे में भी तो हमें सोचना चाहिये। सब सुखी रहें हम यही तो चाहते हैं किंतु सब में से हम अपने आप को क्यों घटा देते हैं?
    पुन: आभार प्रदर्शन के साथ–
    डॉ. मोहनलाल गुप्ता
    www.rajasthanhistory.com

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