Wednesday, August 4, 2010

धिक्कार है ऐसे रुपयों पर तो धिक्कार है ऐसी इज्जत पर भी !


कल के समाचार पत्रों में जयपुर से एक समाचार छपा कि एक महिला ने अपनी सास के उपचार के लिये 500 रुपये नहीं दिये और इस बात पर पति से झगड़ा करके घर में रखे पांच लाख रुपयों के साथ जल कर मर गई। संसार में ऐसा भी कहीं होता है ! रुपये आखिर किस लिये होते हैं ! घर के सदस्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये या फिर जलकर मरने के लिये ! यह पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि इस प्रकरण में जो कुछ भी हुआ, वैसा कभी–कभार ही होता है। अन्यथा कौन नहीं चाहता कि उसके परिजन स्वस्थ रहें और उनका उपचार हो ! लोग तो घर की जमीनें और मकान बेचकर अपने परिजनों का उपचार करवाते हैं, जबकि इस प्रकरण में तो घर में पांच लाख रुपये रखे थे और उनमें से केवल पांच सौ रुपये पति द्वारा मांगे गये थे।
वस्तुत: यह कहानी रुपयों के प्रति मोह की नहीं है। यह कहानी है व्यक्तिगत स्वभाव की विकृति की। स्वभाव की यह विकृति सामान्यत: जन्मगत और व्यक्तिगत होती है किंतु संस्कार जन्य भी होती है। अच्छे संस्कारमय वातावरण में यदि लालन पालन हो तो मनुष्य की व्यक्तिगत विकृतियों को पर्याप्त सीमा तक नियंत्रित किया जा सकता है किंतु आज के जीवन में मनुष्य जिस आपाधापी में लग गया है उसमें संस्कार निर्माण की बात जैसे भुला ही दी गई है। ऐसे लोग इंसानों से नहीं रुपयों से प्यार करते हैं। धिक्कार है ऐसे रुपयों पर!
कल के ही दिन उत्तर प्रदेश में हाथरस के पास स्थित एक गांव का भी समाचार था कि एक आदमी ने अपनी पत्नी के चरित्र पर संदेह होने पर उसकी हत्या करके उसका रक्त अपने दोनों बच्चों को पिलाया। ऐसे जघन्य अपराध भले ही हमारे समाज का वास्तविक चेहरा नहीं हैं किंतु ये जब–तब होते ही रहते हैं। ऐसी दुर्घटनायें भी व्यक्तिगत स्वभाव की विकृति का परिणाम हैं। संस्कारों के अभाव के कारण आदमी अपने क्रोध को नियंत्रण में नहीं रख पाता और ऐसा कुछ कर बैठता है जिसे सुनकर दूसरों का भी कलेजा कांप जाये। जिस इज्जत को लेकर पति इतना क्रोधित हुआ कि इंसानियत की सीमा से नीचे गिरकर हैवान बन गया, धिक्कार है ऐसी इज्जत पर !
वस्तुत: इन दोनों ही प्रकरणों में दण्डित कौन हुआ? क्या केवल वह पति जिसके पांच लाख रुपये और पत्नी जल गई ? या फिर स्वयं वह पत्नी जो अपने ही क्रोध की अग्नि में जलकर भस्म हो गई ? दूसरे प्रकरण में भी वास्तविक दण्ड किसे मिला ? क्या केवल उस पत्नी को जिसे अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा या फिर उस पति को भी जिसने अपने ही हाथों से हंसते खेलते परिवार में आग लगा ली ?
एक अंग्रेज कवि ने लिखा था कि कविता में धन नहीं होता और धन में कविता नहीं होती। वस्तुत: जीवन भी एक ऐसी ही विचित्र पहेली है जिसमें यदि कविता आ जाये तो धन नहीं रहता और धन आ जाये तो कविता नहीं रहती किंतु ये दोनों प्रकरण ऐसे हैं जिनमें न कविता है और न धन है, बस संस्कारहीनता के मरुस्थल में जन्मी हुई मरीचिकाएं हैं जिनके पीछे दौड़ता हुआ मनुष्य छटपटा कर दम तोड़ देता है और तृष्णाएं अतृप्त रह जाती हैं।

1 comment:

  1. क्रोध और द्वेष की पराकाष्ठा।

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