Sunday, August 8, 2010

कड़वा और कठोर किंतु अच्छा निर्णय है नकल पर नकेल !



मैं उन अध्यापकों को बधाई देता हूँ जिन्होंने जोधपुर जिले में माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के पांच परीक्षा केन्द्रों पर इस वर्ष हुई दसवीं कक्षा की परीक्षा को निरस्त करने का कठोर और कड़वा निर्णय करवाने के लिये आगे आकर पहल की। अध्यापकों पर सचमुच बड़ी जिम्मेदारी है, समाज में दिखाई दे रही नैतिक गिरावट ; कोढ़, कैंसर या नासूर का रूप धारण करे, उससे पहले ही हमें इस तरह के प्रबंध करने होंगे। जिन अध्यापकों ने परीक्षा पुस्तिकाओं में सामूहिक नकल की दुर्गन्ध आने पर पुस्तिकाएं जांचने से मना कर दिया और बोर्ड कार्यालय को इन केन्द्रों पर जमकर हुई नकल की सूचना दी वे सचमुच प्रशंसा एवं बधाई के पात्र हैं।


आज उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश एवं बिहार आदि राज्यों में परीक्षाओं के दौरान नकल करवाना एक उद्योग के रूप में पनप गया है, जबकि राजस्थान के अध्यापकों ने एक साथ पांच परीक्षा केन्द्रों पर हुई सामूहिक नकल के षड़यंत्र को विफल करके अद्भुत एवं ऐतिहासिक कार्य किया है। अन्य राज्यों के अध्यापकों को तो यह कदम मार्ग दिखाने वाला होगा ही, साथ ही राज्य के भीतर भी उन अध्यापकों, अभिभावकों एवं छात्रों को भी सही राह दिखायेगा जो नकल के भरोसे बच्चों को परीक्षाओं में उत्तीर्ण करवाना चाहते हैं।


इस निर्णय से अवश्य ही उन परिश्रमी एवं प्रतिभाशाली छात्रों का भी एक वर्ष खराब हो गया है जिन्होंने परीक्षाओं के लिये अच्छी तैयारी की थी किंतु गेहूँ के साथ घुन के पिसने की कहावत यहीं आकर चरितार्थ होती है। अवश्य ही उनके साथ अन्याय हुआ है किंतु इस कठोर और कड़वे निर्णय के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं। पांच परीक्षा केन्द्रों को नकल करवाने वाले केन्द्रों के रूप में चिह्नित होने से उन स्कूलों में नियुक्त शिक्षकों और नकल में सम्मिलित व्यक्तियों को पूरे राज्य के समक्ष लज्जा का अनुभव होन चाहिये जिनके कारण उन विद्यालयों में सामूहिक नकल हुई और कतिपय निर्दोष छात्रों का भी साल खराब हो गया किंतु केवल यह नहीं समझना चाहिये कि राज्य के अन्य परीक्षा केन्द्रों पर नकल नहीं हो रही! आज छात्रों में नकल करने के कई तरीके प्रचलित हैं। संचार के आधुनिक साधनों ने नकल करने और करवाने के अधिक अवसर उपलब्ध करवा दिये हैं।


सब जानते हैं कि दसवीं-बारहवीं कक्षा के बच्चों की समझ कम विकसित होने के कारण नकल की प्रवृत्ति को पूरी तरह नहीं रोका जा सकता किंतु सामूहिक नकल की जिम्मेदारी केवल छात्रों पर न होकर उनके शिक्षकों और अभिभावकों पर होती है। कतिपय अध्यापक ऐसे भी होते हैं जो परीक्षा केन्द्र पर अपने चहेते छात्र को अच्छे अंक दिलवाने के लिये, परीक्षा केन्द्र में बैठे प्रतिभाशाली छात्र पर दबाव बनाते हैं कि वह अमुक छात्र को नकल करवाये। जब यह दृश्य दूसरे परीक्षार्थी देखते हैं तो उनका हौंसला बढ़ता है और फिर उस केन्द्र पर जमकर नकल होती है। इस नकल का कुल मिलाकर परिणाम यह होता है कि कम प्रतिभाशाली छात्र की तो नैया पार लग जाती है किंतु प्रतिभाशाली और परिश्रमी छात्र स्वयं को ठगा हुआ अनुभव करते हैं। अत: नकल पर नकेल कसने का कदम हर तरह से उचित जान पड़ता है।

1 comment:

  1. नकल रोकना बहुत जरूरी है। अन्यथा यह देश को दीमक की तरह नष्ट कर देगा।

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