Thursday, April 15, 2010

धुऑं बहुत है कोटा की गलियों में !

कोटा को शिक्षा की नगरी कहना वस्तुत: सम्पूर्ण राजस्थान की शिक्षा पध्दति का अपमान करना है। राजस्थान सरकार ने पूरे प्रदेश में हजारों विद्यालय, सैंकड़ों महाविद्यालय और दर्जन भर विश्वविद्यालय खोल रखे हैं। पूरे प्रदेश में इंजीनियरिंग कॉलेजों, मेडिकल कॉलेजों, व्यावसायिक शिक्षा के महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों का जाल बिछा हुआ है। इसी प्रकार निजी क्षेत्र में भी हजारों अच्छे विद्यालय एवं सैंकड़ों अच्छे महाविद्यालय खुले हुए हैं। बहुत सी संस्थओं को डीम्ड यूनिवर्सिटी की मान्यता मिली हुई है। फिर क्या कारण है कि कोटा को शिक्षा की नगरी कहा जाये! मेरे विचार से जिस प्रकार कोटा किसी समय औद्योगिक नगरी हुआ करता था, उसी प्रकार अब शिक्षा का बाजार भर है।

विगत डेढ़-दो दशकों में कोटा में कुछ कोचिंग सेंटर ऐसे खुल गये हैं जो ये दावा करते हैं कि उनके यहां पढ़ने वाले बच्चे ही आई. टी. आई. अथवा मेडिकल की परीक्षा में उत्ताीर्ण होते हैं। वास्तव में उनके दावे झूठे हैं। उन्होंने शिक्षा का बाजारीकरण किया है। उन्होंने बच्चों और उनके अभिभावकों को सुनहरे सपने दिखाकर उनके धन और भविष्य से खिलवाड़ करने के कारखाने खोल रखे हैं। जब पूरे देश के प्रतिभावान छात्र कोटा में आकर तैयारी करेंगे तो निश्चित ही है कि कोटा से चयनित होने वाले छात्रों की संख्या पूरे देश के नगरों की अपेक्षा अधिक होगी। यदि ये बच्चे कोटा न आयें और अपने प्रदेश तथा नगर में रहकर ही तैयारी करें तो उनका चयन फिर भी होगा। कोटा के कोचिंग सेंटरों की उपस्थिति से उन्हें लाभ नहीं है, हानि है। क्योंकि इन प्रतिभावान बच्चों को भी कोटा जाना ही पड़ता है। उन्हें यह भय सताता है कि यदि वे कोटा नहीं गये तो कम प्रतिभावान बच्चे बाजी मार ले जायेंगे।

रही बात कम प्रतिभावान बच्चों के चयन की। उन्हें उनके माता-पिता अपने मन के लालच के कारण कोटा की ओर जबर्दस्ती धकेलते हैं। माता-पिता को लगता है कि यदि दो-चार लाख रुपये खर्च करके बच्चे का भविष्य सुधर जाये तो अच्छा है। इनमें से कुछ ही बच्चे ऐसे होते हैं, जो कोचिंग सेंटरों के कठोर प्रशिक्षण के बल पर सफलता प्राप्त करते हैं। अधिकांश बच्चों को असफलता मिलती है। कोचिंग सेंटरों की कठिन पढ़ाई उनके वश की बात नहीं होती। इसलिये बहुत से बच्चे कोटा पहुंचकर सिनेमा देखने, वीडियो पार्लर में गेम्स खेलने, जूस पीने, चाट-पकौड़ी खाने में लग जाते हैं। कुछ बच्चे घोर निराशा, अकेलापन और अवसाद की स्थिति में पहुंचकर कोटा की गलियों में सिगरेट के धुएं से छल्ले बनाकर उड़ाते हैं। कुछ को शराब की लत लग जाती है। कुछ बच्चे नशीली दवाओं के रैकेट में फंस जाते हैं। कुछ बच्चे इन सब कामों में इतना धन खराब कर देते हैं कि वे मोबाइल चुराकर बेचने से लेकर, दुकानों में छोटी-मोटी चोरियां करने लग जाते हैं। कुछ बच्चों को तो पोस्ट ऑफिस में डकैती करते हुए भी पकड़ा जा चुका है।

पिछले साल करौली में रहने वाले बच्चे ने अपने ही अपहरण का ड्रामा रचा। परीक्षा देने से बचने के लिये वह तीन दिन तक नोएडा में जाकर छिपा रहा। जब परीक्षा समाप्त हो गई तो उसने पुलिस के समक्ष उपस्थित होकर अपने अपहरण की झूठी कहानी सुनाई। इसीलिये यदि यह कहा जाये कि कोटा की गलियों में धुंआ बहुत है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

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