अहमदाबाद में कचरे की पेटी में पड़े हुए 15 कन्या भ्रूण मिले। कुछ भ्रूण कुत्ते खा चुके थे, वास्तव में संख्या 15 से कहीं अधिक थी। ये तो वे भ्रूण थे जो रास्ते पर रखी कचरे की पेटी में फैंक दिये जाने के कारण लोगों की दृष्टि में आ गये। यह कार्य तो पता नहीं चोरी–चोरी कब से चल रहा होगा! टी वी के पर्दे पर इस हृदय विदारक दृश्य को देखकर आत्मा कांप उठी।
यह कैसी दुनिया है जिसमें हम रह रहे हैं! ये कौनसा देश है जिसकी दीवारों पर मेरा भारत महान लिखा हुआ रहता है किंतु कचरे के ढेरों में कन्याओं के भ्रूण पड़े मिलते हैं!क्या इसमें कोई संदेह है कि ये भ्रूण उन्हीं माताओं के गर्भ में पले हैं जिनकी सूरत में संतान भगवान का चेहरा देखती है! क्या इसमें भी कोई संदेह है कि ये गर्भपात उन्हीं पिताओं की सहमति और इच्छा से हुए हैं जिन्हें कन्याएं भगवान से भी अधिक सम्मान और प्रेम देती हैं! क्या इसमें भी कोई संदेह है कि ये गर्भपात उन्हीं डॉक्टरों ने करवाये है जिन्हें धरती पर भगवान कहकर आदर दिया जाता है!
देश में हर दिन कचरे के ढेर पर चोरी–चुपके फैंक दिये जाने वाले सैंकड़ों कन्या भ्रूण धरती के भगवानों से चीख–चीख कर पूछते हैं कि क्या औरतों के बिना यह दुनिया चल सकती है! इस सृष्टि में जितने भी प्राणी हैं उन्होंने अपनी माता के गर्भ से ही जन्म लिया है। भगवानों के अवतार भी माताओं के गर्भ से हुए हैं। जब माता ही नहीं होगी, तब संतानों के जन्म कैसे होंगे। यदि हर घर में लड़के ही लड़के जन्म लेंगे तो फिर लड़कों के विवाह कैसे होंगे। जिस वंश बेल को आगे बढ़ाने के लिये पुत्र की कामना की जाती है, उस पुत्र से वंश बेल कैसे बढ़ेगी यदि उससे विवाह करने वाली कोई कन्या ही नहीं मिलेगी!
आज भारत का लिंग अनुपात पूरी तरह गड़बड़ा गया है। उत्तर भारत में यह कार्य अधिक हुआ है। लाखों लोगों ने अपनी कन्याओं को गर्भ में ही मार डाला। दिल्ली, पंजाब और हरियाणा देश के सर्वाधिक समृद्ध, शिक्षित और विकसित प्रदेश माने जाते हैं, इन्हीं प्रदेशों में गर्भपात का जघन्य अपराध सर्वाधिक हुआ। मध्य प्रदेश और राजस्थान भी किसी से पीछे नहीं। जब से लोगों के मन में धर्म का भय समाप्त होकर पैसे का लालच पनपा है और ईश्वरीय कृपा के स्थान पर पूंजी और टैक्नोलोजी पर भरोसा जमा है, तब से औरत चारों तरफ से संकट में आ गई है।
पिताओं और पतियों के मन में चलने वाला पैसे का गणित, औरतों के जीवन के लिये नित नये संकट खड़े कर रहा है। एक तरफ तो औरतों को पढ़ने और कमाने के लिये घर से बाहर धकेला जा रहा है। दूसरी ओर सनातन संस्कारों और संस्कृति से कटा हुआ समाज औरतों को लगातार अपना निशाना बना रहा है। यही कारण है कि न्यूज चैनल और समाचार पत्र महिलाओं के यौन उत्पीड़न, बलात्कार और कन्या भ्रूण हत्याओं के समाचारों से भरे हुए रहते हैं। आरक्षण, क्षेत्रीयता और भाषाई मुद्दों पर मरने मारने के लिये तुले रहने की बजाय हमें अपने समाज को सुरक्षित बनाने पर ध्यान देना चाहिये, इसी में सबका भला है।
Wednesday, April 21, 2010
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