Sunday, April 18, 2010

क्या जावा और सी प्लस प्लस के समक्ष देशज भाषायें टिक पायेंगी !

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय से ही राजस्थान में राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूचि में संलग्न करवाये जाने को लेकर आंदोलन चल रहा है। संभवत: इतनी बड़ी अवधि तक भारत भर में आज तक और कोई आंदोलन नहीं चला किंतु फिर भी इस आंदोलन को सफलता प्राप्त नहीं हो सकी। इसका सबसे बड़ा कारण इस आंदोलन को व्यापक जन समर्थन प्राप्त नहीं होना है। जब भी इसे मान्यता देने की बात जोर-शोर से उठती है तो मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूंढाड़ी, हाड़ौती, वागड़ी आदि बोलियां आपस में लड़ने लग जाती हैं। दबे स्वर में चूरू, सीकर और झुंझुनू से शेखावाटी भाषा; धौलपुर, भरतपुर और करौली से ब्रजभाषा; अलवर और भरतपुर से मेवाती भाषा; झालावाड़, कोटा और चित्तौड़गढ़ से मालवी भाषा; श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ से पंजाबी भाषा; और गुजरात से लगते हुए कुछ जिलों से गुजराती भाषायें भी रोष प्रकट करने लगती हैं।

जिस प्रकार किसी समृध्द बगीचे में कोई एक पुष्प नहीं होता, पुष्पों का विशाल परिवार होता है, उसी प्रकार वीर प्रसूता धरा के रूप में विख्यात राजस्थान में भाषाओं और बोलियों का एक विशाल गुच्छा है जिसका प्रत्येक पुष्प मनमोहक एवं चटखीले रंगों वाला है। प्रत्येक भाषा की मनभावनी मीठी सुगंध है। राजस्थान में इतनी बोलियाँ बोली जाती हैं कि प्रत्येक 10-12 किलोमीटर की दूरी पर बोली बदल जाती है। प्रत्येक क्षेत्र और जाति की अपनी बोली है जो कुछ अंतर के साथ बोली जाती है।

अहीरी, भोपाली, लुहारी, जंभूवाल, कोरा बंजारी, अहीरवाटी, भोपारी, गाडौली, लमानी, अगरवाली, भुआभी, गोडवानी, जैसलमेरी, अजमेरी, बीकानेरी, गोजरी, झामरल, लश्करी, अलवरी, चौरासी, गोल्ला, जोधपुरी, बाचड़ी, छेकरी, लाहोरी राजस्थानी, गुजरी, कालबेली, बागड़ी, अंडैरी, गर्वी, खेराड़ी, महाजनी, ढांडी, हाड़ौती, कांचवाड़ी, बंगाला, ढूण्डारी, हत्तिया की बोली, खण्डवी, महाराजशाही, बनजारी, डिंगल, किर, महेसरी, बेतुली, गाड़िया, जयपुरी, किशनगढ़ी, मारवाड़ी, मेवाड़ी, नीमाड़ी, राजहरी, सिपाड़ी, गाेंड़ी मारवाड़ी, मेवाती, ओसवाली, राजवाटी, सोंडवाड़ी, नागौरी, पल्वी, राजपुतानी, टडा, मेजवाड़ी, नगर, चोल, पटवी, राजवाड़ी, थली, माधुरी बंजारी, नाइकी बंजारी, शेखावाटी, उज्जैनी आदि बोलियों के नाम तो मैं भी गिना सकता हूँ जबकि वास्तविक बोलियों की संख्या अत्यधिक है। इनमें से मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूंढाड़ी, हाड़ौती, मेवाती, मालवी और बागड़ी बोलने वाले लोगों की संख्या सर्वाधिक है।

इतनी सारी बोलियों के विद्यमान रहते यह प्रश्न सदा ही परेशान करता है कि राजस्थानी भाषा का वास्तविक रूप कौनसा है! एक समय था जब राजपूताने के संत, कवि राजे-महाराजे, राजकुमारियां, चारण, भाट और जन सामान्य ब्रज भाषा में कविता करने को ही कविता की कसौटी मानते थे। चाहे कोटा, किशनगढ़, उदयपुर और जयपुर के राजे-महाराजे अथवा जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर और सिरोही की राजकुमारियां, सबने अपने आप को ब्रज में कविता करके धन्य माना। वस्तुत: आज जिन मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूंढाड़ी, हाड़ौती आदि भाषाओं को हम राजस्थानी भाषा के रूप में जानते हैं, वे सब भाषायें डिंगल में से निकली हैं और जिस भाषा को हम भाषाओं की राजरानी ब्रजभाषा के रूप में जानते हैं, वह पिंगल से निकली हैं। इतिहास साक्षी है कि डिंगल और पिंगल सगी बहनें हैं और इन दोनों ने भाषाओं की महामाता संस्कृत के गर्भ से जन्म लिया है।

आज के युग में वास्तविक समस्या यह नहीं है कि किन भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में रखा अथवा निकाला जाये! आज के समय में वास्तविक समस्या यह है कि जब अंग्रेजी, रूसी, जर्मनी, जापानी और हिन्दी जैसी अति विकसित भाषायें भी कम्प्यूटर की सी प्लस-प्लस और जावा जैसी आरंभिक भाषाओं के समक्ष प्रभावहीन हो गई हैं तब क्या हमारी देशज भाषाएं आने वाले रोबोटिक युग पर शासन करने वाली नैनो टैक्नोलॉजी के भीषण प्रहारों का सामना कर सकेगी!

6 comments:

  1. गुप्ता जी, माफी चाहता हूँ। आप राजस्थान सरकार के पब्लिक रिलेशन अधिकारी हैं और कोटा झालावाड़ की बोली को मालवी बता रहे हैं। आप की जानकारी पर न्यौछावर होने का मन करता है। लगता है आप को हाड़ौती बोली का ज्ञान ही नहीं है।
    आंदोलन का प्रश्न नहीं है। राजस्थानी का कोई भी स्वरूप क्यों न हो लेकिन उसे उचित आदर मिलना चाहिए। कम से कम राजस्थान सरकार को तो उस के संरक्षण के लिए कुछ करना ही चाहिए। आज भी ग्रामीण प्राथमिक शालाओं में हिन्दी को राजस्थानी के माध्यम से ही सिखाया जाता है अन्यथा बच्चे उसे ग्रहण ही नहीं कर सकते।
    अब आप जावा और सी प्लस और सी प्लस प्लस की बात कर रहे हैं तो ये पढ़ने लिखने की भाषाएँ नहीं हैं और न हो सकती हैं। ये केवल संगणकों को संचालित करने की भाषाएँ हैं और न इन में हर किसी का पारंगत होना संभव है।

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  2. पहली बात तो यह कि कम्प्यूटर भाषाएं ज्यादा मरतीं हैं। इनकी आयु बहुत कम होती है।

    आपके लेख से यह जानकारी मिली कि राजस्थान में बोलियों का कितना बाहुल्य है। मेरे खयाल से इसका सामान्यीकरण किया जा सकता है और कहा जा सकता है कि भारत सहित दुनिया के सभी हिस्सों में बोलियों का बाहुल्य है। यह इंग्लैंड के लिये भी सही है, चीन के लिये भी और अफ्रीका के लिये भी।

    अभी-अभी एक लेपढ़ा; उसका लिंक दे रहा हूँ -

    हिन्दी में दी जाय शिक्षा (प्रात:काल)
    http://pratahkal.com/index.php?option=com_content&task=view&id=129921

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  3. जावा अमर है? भैय्या कहां जी रहे हो जावा तो कब की मर खप चुकी, उसके बनाने वाले ने अभी अभी ओरेकल से त्याग पत्र तक दे दिया (मतलब जावा खतम!)

    अब जावा की जगह तो स्काला ही स्काला है (Scala)... उसके बारे में सुना है या किसी भारतीय विश्वविद्यालय से निकले MCA हैं?

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  4. श्रीमान आप को ज्ञात हो कि हिंदी मैं कितनी प्रकार की बोलियां है....हर प्रदेश के हिंदी बोलने का तरीका ...लहजा सब अलग है.....अंग्रेजी और हर भाषा के साथ ऐसा ही हैं.....तो राजस्थानी मैं कुछ ज्यादा विविधता है.....ये इसके समृद्ध होने का परिचायक है न कि कमजोरी....खै्र आप जैसे अफसरों को निश्चित रूप से मारवाङी बोलने मैं शर्म आती होगी इसका क्या किया जाये

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  5. विचार विमर्श किसी विषय की आत्मा पर हो तो अच्छा लगता है। केवल विषय के शरीर पर ही सारी बात को उलझा देना, उसके आत्मिक पक्ष को उपेक्षित करना है।

    आदरणीय दिनेश रायजी द्विवेदी को नमस्कार। मैंने अपने लेख में मालवी से पहले हाड़ौती भाषा का उल्लेख किया है। उसके बाद की पंक्तियों में झालावाड़, कोटा और चित्तौड़गढ़ जिलों की मालवी भाषा का उल्लेख किया है। वस्तुत: मैं कभी भी इन जिलों में नहीं रहा, मैंने केवल अन्य पुस्तकों में ही पढ़ा है कि इन जिलों में (अर्थात् इन जिलों के कुछ हिस्सों में ) मालवी भाषा भी बोली जाती है। हो सकता है कि यह जानकारी बिल्कुल गलत हो। यदि दिनेश रायजी बता सकें कि राजस्थान के किसी भी भू–भाग में मालवी बोली जाती है कि नहीं, तो मेरा लाभ होगा।

    आदरणीय सुनील कुमारजी! रही बात जावा और स्काला की तो एक बार फिर मेरा अनुरोध है कि लेख का आशय कम्प्यूटर की किसी भाषा विशेष से नहीं है, केवल कम्प्यूटरी युग में वर्तमान में प्रयुक्त एवं भविष्य में आने वाली समस्त भाषाओं से है। हाँ यह अवश्य सच है कि हर कोई आपकी तरह अमरीका से एम सी ए करके नहीं आ सकता। कुछ बेचारे हमारे जैसे भी हैं, जिन्हें भारत से भी एम सी ए करना नसीब नहीं होता।

    मिहिरभोज जी! मेरे आलेख का मूल भाव यह था कि क्या हम अपनी देशज भाषाओं को आने वाले समय में भी बचाये रख सकने के लिये कुछ कर सकने की स्थिति में हैं! न कि यह बताना कि मुझे राजस्थानी बोलने में शर्म आती है। पता नहीं आपको यह गंध कहां से आ गई कि मुझे राजस्थानी बोलने में शर्म आती है! लेख अभी भी ब्लॉग पर जस का तस मौजूद है, चाहे तो एक बार फिर से पढ़ लें!

    फिर भी रुचि लेकर लेख पढ़ने और उस पर अपनी सम्मतियाँ देने के लिये धन्यवाद क्योंकि आत्मा भले ही कितनी सुंदर क्यों न हो शरीर का भौण्डापन भी लोगों की आलोचना अथवा उपेक्षा का शिकार बनता ही है।

    – डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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